सजीवों में परिवहन (Transport)

पौधों और मानव शरीर में परिवहन तंत्र का विस्तृत अध्ययन

परिवहन - एक परिचय

परिवहन, सजीव की एक अनिवार्य जीवन प्रक्रिया है, जिसमें सजीव के शरीर के एक अंग में अवशोषित पदार्थ, उसके शरीर के दूसरे अंगों में ले जाया जाता है । परिवहन द्वारा सजीवों की प्रत्येक कोशिका में लगातार जल, खनिज लवण, ऑक्सीजन तथा पोषक-पदार्थों की आपूर्ति होते रहता है और कोशिका में बने अनुपयोगी तथा हानिकारक पदार्थ का लगातार निष्कासन होते रहता है । एककोशिकीय जीवों (जीवाणु, प्रोटोजोआ, यूग्लीना आदि) में विभिन्न पदार्थों का परिवहन विसरण विधि के द्वारा होता है जबकि बहुकोशिकीय जीवों में परिवहन हेतु परिवहन तंत्र बने होते हैं । पौधे तथा जन्तु (मानव) का परिवहन तंत्र एक समान नहीं होता है, दोनों में परिवहन-तंत्र अलग-अलग प्रकार के होते हैं

पौधों में परिवहन (Transport in Plant)

पौधों में मुख्य रूप से जल, खनिज लवण तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने भोजन, एक भाग से पौधों के अन्य में भागों में परिवहन होता है । पौधों में परिवहन हेतु संवहन तंत्र (Vascular-system) पाये जाते हैं, जिसके अंतर्गत जाइलम तथा फ्लोएम उत्तक आते हैं । पौधों में परिवहन के जाइलम तथा फ्लोएम उत्तक द्वारा होता है । यह उत्तक पूरे पौधे (जड़, तना एवं पत्तों) में फैले होते हैं । जाइलम में जल खनिज लवणों जल तथा खनिज लवण के परिवहन हेतु उत्तरदायी है तथा फ्लोएम भोजन परिवहन हेतु

पौधों में जल तथा खनिज लवणों का परिवहन :

पौधे जल मिट्टी से ग्रहण करते हैं । जड़ में मूल रोम (Roothairs) नामक संरचना पायी जाती है, जो विसरण विधि द्वारा मिट्टी में स्थित जल को ग्रहण करते हैं । मूल रोम द्वारा अवशोषित जल, जड़ के बाह्य त्वचा (Epidermis), कॉर्टेक्स (Cortex) तथा अंतः त्वचा (Endodermis) से होता हुआ जड़ में स्थित जाइलम उत्तक में आते हैं । मूलरोम द्वारा अवशोषित जल को बाह्य त्वचा, कॉर्टेक्स तथा अंतः त्वचा से होते हुए, जाइलम तक पहुँचने हेतु पौधों के जड़ में एक प्रकार का दाब उत्पन्न होता है, इस दाब को मूलदाब (Root Pressure) कहते हैं । मूल दाब जड़ के उपापचयी क्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं एवं इसके लिए जड़ों का जीवित होना आवश्यक है । जाइलम उत्तक के द्वारा जल जड़ों से तना एवं पत्तियों तक पहुँचता है । जाइलम उत्तक से जल का तना तथा पत्तियों तक पहुँचने में वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) का विशेष महत्व है । वाष्पोत्सर्जन के कारण ही जाइलम से जल ऊपर ही ऊपर (तना, पत्ती की ओर) खींचता है । जिसे वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration pull) कहते हैं । पौधे के पत्ती की कोशिकाओं से जल का लगातार वाष्पीकरण के कारण जाइलम के ऊपरी सिरे पर दाब कम हो जाता है जबकि जाइलम के आधार पर दाब अधिक रहता है । दाबों के अंतर के कारण एक प्रकार का चूषण उत्पन्न होता है जो जाइलम से होकर जल को ऊपर खींचता है । जल के परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन का होना अनिवार्य है । जल का परिवहन में जाइलम के वाहिकाएँ (Vessels) तथा वाहिनिकाएँ (Tracheids) कोशिका भाग लेती हैं

पौधों को अपनी समुचित वृद्धि हेतु 17 पोषक तत्वों की जरूरत होती है जिनमें अधिकांश पोषक तत्व पौधा मिट्टी से ही ग्रहण करते हैं तथा इन खनिज लवणों का परिवहन जल में घुलित रूप में जाइलम द्वारा ही होता है । मिट्टी में स्थित खनिज लवणों का अवशोषण जड़ के मूल रोम द्वारा आयन के रूप में होता है, परन्तु उस प्रकार नहीं, जिस प्रकार जल का अवशोषण होता है । खनिज लवणों का अवशोषण हेतु मूलरोम की कोशिकाओं के सतह पर विशेष प्रकार के वाहक प्रोटीन और एंजाइम पाये जाते हैं और इस क्रिया हेतु पौधों को ATP के रूप ऊर्जा खर्च करना पड़ता है । मूलरोम द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण होने के बाद इनका वितरण पौधे के विभिन्न भागों जैसे- तना, शाखाएँ तथा पत्तियों तक होता है । पौधे में जल तथा घुलनशील लवणों के मूलरोम से पत्तियों तक पहुँचने की क्रिया को रसराहण (Ascent of sap) कहते हैं

पौधों में भोजन परिवहन :

पौधों के सभी भागों में भोजन का निर्माण अर्थात् प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है । इसलिए पौधों में भोजन का ऐसे स्थानों से, जहाँ उसका निर्माण होता है या वे संचित रहते हैं, दूसरे भागों में जहाँ उनका निर्माण नहीं होता है, स्थानांतरण जरूरी है । पौधे के एक भाग से दूसरे भागों में भोजन का परिवहन जलीय घोल के रूप होता है । इन भोजन का परिवहन फ्लोएम उत्तक के द्वारा होता है । फ्लोएम में खाद्य-पदार्थ मुख्यतः सुक्रोज के रूप में परिवाहित होते हैं । पौधों में भोजन का परिवहन हमेशा अधिक सांद्रता वाले भागों से कम सांद्रता वाले भागों की ओर होता है । अधिक सांद्रता वाले भाग को संभरण सिरा (Supply end) तथा कम सांद्रता वाले भाग को उपभोग सिरा (Consumption end) कहते हैं । फ्लोएम में भोजन का परिवहन चालनी नालिका तथा सहकोशिकाओं के द्वारा होता है तथा भोजन के परिवहन में पौधों को ऊर्जा खर्च करना पड़ता है । पौधों के जाइलम का परिवहन एकदिशीय होता है लेकिन फ्लोएम से भोजन का परिवहन द्विदिशीय होता है । पौधों को जल परिवहन हेतु ऊर्जा खर्च नहीं करना पड़ता है लेकिन मिट्टी से खनिज लवणों के अवशोषण तथा भोजन परिवहन में ऊर्जा खर्च करना पड़ता है । जिस परिवहन में ऊर्जा खर्च होता है, उसे सक्रिय पारगमन (Active Transport) कहा जाता है

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)

पौधों में वायवीय भाग (Aerial part). मुख्य रूप से पत्तियों से जल का वाष्प के रूप में बाहर निकलना वाष्पोत्सर्जन कहलाता है । लगभग 90 प्रतिशत से भी ज्यादा वाष्पोत्सर्जन पौधों में पत्ती के द्वारा होता है । पत्ती में छोटे-छोटे सूक्ष्म छिद्र होते हैं । इस छिद्र को रंध्र (Stomata) कहते हैं । वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया में पत्ती में स्थित रंध्र से ही जल वाष्प के रूप में निकलता है । द्विबीजपत्री पौधों में रंध्र पत्ती के नीचे सतह पर होता है । एक बीजपत्री पौधों में रंध्र पत्ती के ऊपरी तथा नीचली दोनों सतह पर पाये जाते हैं । जलोद्भिद् पौधों में रंध्र नहीं पाये जाते हैं । मरुस्थलीय (Xerophytes) पौधों में वाष्पोत्सर्जन कम हो इसलिए इन पौधों का पत्ती छोटा होता है तथा रंध्र स्टोमेटल कैविटी (Stomatal Cavity) में धँसे होते हैं । वाष्पोत्सर्जन का कुछ भाग (3-8 प्रतिशत) पौधे के तना द्वारा होता है । तने में उत्तल लेंस आकार के छिद्र होते हैं, जिसे वातरंध्र (lenticels) कहते हैं । तने में वातरंध्र के माध्यम से ही वाष्पोत्सर्जन की क्रिया सम्पन्न होती है । वाष्पोत्सर्जन क्रिया से निकलते जल की मात्रा सभी पौधों में समान नहीं होते हैं । छोटे पौधे में वाष्पोत्सर्जन द्वारा कम जल निष्कासित होते हैं, वहीं बड़े वृक्षों में काफी जल निष्कासित होते हैं, औसतन एक पेड़ अपने पूरे जीवन काल में अपने भार के करीब 100 गुणा जल को वाष्पोत्सर्जित करते हैं

वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया मुख्यतः दिन में होता है, क्योंकि रात में रंध्र बंद हो जाते हैं । रंध्र को बंद तथा खोलने का कार्य द्वार-कोशिका (Guard cell) द्वारा होता है । द्वार-कोशिका रंध्र को चारों ओर से घेरे रहती है । पौधों मिट्टी से जितने जल को ग्रहण करते हैं उसका 90 प्रतिशत से अधिक भाग वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण में निष्कासित कर देती है । वाष्पोत्सर्जन को पौधा का आवश्यक द्रव्य माना जाता है क्योंकि वाष्पोत्सर्जन से काफी जल की निरर्थक हानि होती है लेकिन पौधों में जल तथा खनिज लवणों के परिवहन के लिए यह आवश्यक है । पौधों के लिए वाष्पोत्सर्जन के महत्व को हम निम्नलिखित कारणों से समझ सकते हैं-

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाला कारक :

पौधों के लिए आवश्यक खनिज पोषण (Essential Mineral Elements in plant)

अब तक ज्ञात तत्वों में से 60 से भी अधिक तत्व विभिन्न प्रकार के पौधों में पाये जाते हैं, लेकिन इतने सारे तत्व पौधों के विकास हेतु आवश्यक नहीं होते हैं । जिन तत्वों के अभाव में पौधों का विकास भीमा पड़ जाए अथवा रुक जाये उसे 'आवश्यक तत्व' कहते हैं । पौधों के लिए आवश्यक तत्व को दो श्रेणी में विभक्त किया गया है-

पौधों के लिए कुल 17 पोषक तत्व आवश्यक होते हैं । 17 पोषक तत्व के अतिरिक्त कुछ पुष्पीय पौधों को, कोबाल्ट, सेलेनियम, सोडियम, सिलिकान जैसे तत्वों की भी आवश्यकता होती है । पौधों के लिए प्रमुख आवश्यक पोषक तत्व एवं उनके कार्य निम्नलिखित हैं-

मानव शरीर में परिवहन (Transport in Human Body)

मानव शरीर का परिवहन तंत्र अतिक्रियाशील होता है जो ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक तत्व, हॉर्मोन तथा उत्सर्जित हानिकारक पदार्थ को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुँचाते हैं । मानव के परिवहन तंत्र को रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood circulatory system) भी कहा जाता है क्योंकि परिवहन में रक्त की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण होता है । मानव का परिवहन तंत्र में हृदय, रक्तवाहिनी तथा रक्त आते हैं

हृदय (Heart)

मानव का हृदय की रचना बंद मुट्ठी के समान या त्रिकोनी आकृति का होता है । हृदय वक्षगुहा में दोनों फेफड़ों के बीच अवस्थित रहता है तथा थोड़ा सा बाईं तरफ झुका रहता है । हृदय अत्यंत कोमल तथा मांसल रचना है जिसका निर्माण हृदय पेशी (Cardiac Muscles) से हुआ है । हृदय को बाहरी अभातों से सुरक्षा देने हेतु इस पर दोहरी झिल्ली की परत चढ़ी रहती है जिसे Pericardial membrane कहा जाता है । Pericardial membrane के दोनों परतों के बीच रंगहीन, गाढ़ा द्रव भरा रहता है जिसे Pericardial fluid कहा जाता है । Pericardial fluid झिल्ली तथा हृदय के परतों के बीच घर्षण होने नहीं देता है । मनुष्य के हृदय में चार कक्ष होते हैं । हृदय के ऊपर के दो कक्ष दायाँ और बायाँ अरिलंद (Auricle) तथा नीचे के दो कक्ष दायाँ और बायाँ निलय (Ventricle) कहलाता है । हृदय के ऊपरी दोनों अरिलंद वाला कक्ष नीचले दोनों निलय वाले कक्ष के तुलना में अधिक चौड़े होते हैं । हृदय का दायाँ अरिलंद-निलय तथा बायाँ अरिलंद निलय सेप्टम (Septum) नामक संरचना द्वारा अलग रहता है । हृदय के दाँये अरिलंद तथा निलय के बीच त्रिदली कपाट (tricuspid valve) पाया जाता है । यह कपाट रक्त को हृदय के अरिलंद से निलय में आने देते परंतु निलय से अरिलंद में जाने नहीं देते हैं । हृदय के बाँये अरिलंद तथा निलय के बीच द्विदली कपाट (Bicuspid Valve) या मिट्रल कपाट (Mitral valve) पाया जाता है । यह कपाट रक्त को बाँये अरिलंद से बाँये निलय में आने देता है परंतु बाँये निलय से बाँये अरिलंद में जाने में रोक देता है । हृदय के दाँये अरिलंद में दो अपरमहाशिरा (Precaval Vein) तथा एक पश्च महाशिरा (Postcaval Vein) खुलती हैं । ये तीनों महाशिराएँ शरीर का अशुद्ध रक्त (ऐसा रक्त जिसमें ऑक्सीजन के तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड ज्यादा है।) दाँये अरिलंद में पहुँचता है

दाँये अरिलंद से अशुद्ध रक्त दाँये निलय में आ जाता है । दाँये निलय में एक बड़ी फुफ्फुस चाप (Pulmonary arch) पायी जाती है जो, आगे की ओर दो फुफ्फुस धमनियों में बँटकर दोनों फेफड़ा तक जाती है । फुफ्फुस धमनियों के द्वारा अशुद्ध रक्त साफ होने हेतु फेफड़ा में पहुँचती है । हृदय के बाँये अरिलंद में दो फुफ्फुस शिराएँ (Pulmonary vein) खुलती हैं, जिसके द्वारा फेफड़ा से शुद्ध रक्त (रक्त जिसमें ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड के तुलना में ज्यादा है।) बाँये अरिलंद में आती है । शुद्ध रक्त बाँये निलय में आ जाती है । बाँये निलय से महाधमनी (aorta) निकलती है । बाँये निलय से शुद्ध रक्त महाधमनी से होते हुए शरीर के सभी धमनियों में जाती है अततः ये धमनियाँ शरीर के सभी भागों में शुद्ध रक्त को प्रवाहित कर देती हैं । मानव का हृदय शरीर के सभी भागों का अशुद्ध रक्त ग्रहण करता है फिर उसे साफ करने हेतु फेफड़ा में भेज देता है । पुनः फेफड़ा से शुद्ध रक्त ग्रहण कर शरीर के विभिन्न भागों में पंप कर देता है । हृदय मानव शरीर का केन्द्रीय पंप अंग (Central Pumping Organe) है जो रक्त पर दाब डालकर उसे पूरे शरीर में प्रवाहित करवाता है

हृदय द्वारा रक्त पर दाब बनाने हेतु, इसमें लगातार संकुचन (Contraction) तथा शिथिलन (Relaxation) होते रहता है । हृदय में होने वाले संकुचन को सिस्टोल (Systole) कहते हैं और शिथिलन को डायस्टोल (Diastole) कहते हैं । हृदय के सभी कक्षों में बारी-बारी से संकुचन तथा शिथिलन होता है, एक साथ नहीं । जब हृदय के दोनों अरिलंद में संकुचन होता है उसी समय दोनों निलय में शिथिलन होता है तथा जिस समय दोनों निलय में संकुचन होता है उसी समय दोनों अरिलंद में शिथिलन होता है । हृदय का एक संकुचन (Systole) तथा एक शिथिलन (Diastole) मिलकर एक धड़कन कहलाता है । मनुष्य में 1 मिनट में 72 से 75 धड़कने होती है अर्थात् एक धड़कन में 0.80 से 0.83 सेकंड का समय लगता है । हृदय के एक धड़कन में 70 ml. रक्त पंप होता है एवं हृदय लगभग 5 लीटर रक्त प्रति मिनट पंप करता है

जब हृदय के सिकुड़ने (systole) से धमनियों में उच्च दबाव के साथ रक्त प्रवाहित होता है, तब इस दाब का मान 120 mmHg के बराबर होता है । हृदय शिथिल (Diastole) होकर जब शिराओं से रक्त खींचता है तब दाब घटकर 80 mmHg हो जाता है । इस दाब को 120/80 रक्त दाब के रूप में लिखा जाता है जो मानव का सामान्य रक्त दाब है । मानव के रक्त दाब को मापने हेतु स्कर्गमो मनोमीटर यंत्र उपयोग किया जाता है । हृदय के प्रत्येक धड़कन के साथ-साथ दो स्पष्ट ध्वनि उत्पन्न होती है । सिस्टोल के समय ‘लब्’ तथा डायस्टोल के समय ‘डब्’ ध्वनि उत्पन्न होती है । यह ध्वनि हृदय के अंदर पाये जाने वाले कपाट (Valve) के बंद होने तथा खुलने के कारण उत्पन्न होती है । हृदय में उत्पन्न ध्वनि को आला (Stethoscope) नामक यंत्र से सुना जाता है

हृदय के धड़कनों का नियंत्रण हृदय के दाँये अरिलंद में पाये जाने वाले एक तंत्रिका उत्तक की गाँठ, जिसे S-A node (Sinu-auricular node) कहते हैं के द्वारा होता है । S-A node को हृदय का गति प्रेरक तथा पेसमेकर भी कहा जाता है । धड़कनों के नियंत्रण हेतु S-A node से विद्युतिय तरंग उत्पन्न होता है । S-A node से निकलने वाली विद्युतिय तरंग सीधे अरिलंद के दिवारों में फैल जाता है, उसके बाद यह तरंग दोनों निलय के बीच पाये जाने वाले तंत्रिका उत्तक A-V node (auriculo - ventricular node) ग्रहण कर लेता है । A-V node से विद्युतिय तरंग की संवेदना तंतुओं का बंडल (Bundle of His) के द्वारा नीचे आती है और निलय के दिवार में स्थित पतले-पतले तंतु जिसे पुरकिंजे का तंतु (Purkinje fibres) कहते हैं, में फैल जाती है । S-A द्वारा उत्पन्न विद्युतिय तरंग हृदय के अंदर अत्यंत ही धीमी गति से प्रवाहित होती है । हृदय के धड़कन के विशेष नियंत्रण हेतु S-A node पर सिम्पैथेटिक तथा पैगस नामक दो तंत्रिका-तंतु जुड़े रहते हैं । सिम्पैथेटिक तंतु हृदय गति को बढ़ाता है और पैगस तंतु हृदय गति को घटाता है । S-A node द्वारा उत्पन्न विद्युतिय तरंग के अध्ययन से हृदय की सामान्य क्रिया तथा हृदय रोगों का अनुमान लगाने को जा सकता है । इसके लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (Electrocardiogram-ECG) नामक उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है । कलाई की धमनियों को अंगुली से हल्का दबा कर रक्त के बढ़ते एवं घटते दबाव का अनुमान लगाने को, नाड़ी दर या स्पंदन दर (Pulse-rate) मापना कहते हैं । नाड़ी दर का मान हृदय धड़कनों की संख्या के बराबर होता है, क्योंकि नाड़ी की गति हृदय के संकुचन एवं शिथिलन से होता है

रक्त वाहिनियाँ या रक्त-नली (Blood-Vessels)

पूरे शरीर में रक्त के परिसंचरण हेतु निम्न प्रकार के रक्त-नलियाँ पायी जाती हैं-

रूधिर या रक्त (Blood)

रक्त तरल संयोजी उत्तक है, इसे परिवहन संयोजी उत्तक भी कहा जा सकता है । एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य में 5 से 6 लीटर रक्त पाया जाता है । रक्त एक संयोजी उत्तक है, अतः इसमें कोशिकाओं की संख्या बहुत कम होती है । रक्त में 45 प्रतिशत रक्त कोशिकाएँ पायी जाती हैं । शेष 55 प्रतिशत भाग रंगहीन जलीय घोल के रूप में पाया जाता है जिसे रक्त प्लाज्मा (Blood Plasma) कहा जाता है । रक्त का सामान्य pH स्तर 7.35 से 7.45 के बीच होता है

रक्त प्लाज्मा (Blood Plasma)

प्लाज्मा में 90 प्रतिशत जल पाये जाता है । शेष 10 प्रतिशत में प्रोटीन, वसा, ग्लूकोज तथा अन्य कई कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ पाये जाते हैं । प्लाज्मा में जल के अतिरिक्त उपस्थित विभिन्न पदार्थ के कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ की औसत मात्रा इस प्रकार है-

प्लाज्मा में उपस्थित विभिन्न प्रकार के कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ की मात्रा हमेशा नियत नहीं रहती है । विभिन्न प्रकार के रोगों में इन पदार्थ की मात्रा परिवर्तित हो जाता है, यही कारण है रक्त की जाँच कर चिकित्सक रोगों का पहचान करते हैं । प्लाज्मा में पाये जाने वाले प्रोटीन-एल्बुमिन, ग्लोब्यूलिन तथा फाइब्रीनोजेन को प्लाज्मा प्रोटीन भी कहा जाता है । इन प्रोटीन का निर्माण मानव-यकृत में होता है । रक्त प्लाज्मा में अत्यधिक मात्रा में एल्बुमिन प्रोटीन घुले होने के कारण ही रक्त गाढ़ा, लसलसा तथा श्यान (Viscous) होता है । रक्त प्लाज्मा कार्बन डाइऑक्साइड, हॉर्मोन तथा कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जित अपशिष्ट पदार्थ के परिवहन का कार्य करते हैं । अगर शरीर के किसी भी अंग में किसी प्रकार की खराबी होती है या कोई नया रसायनिक पदार्थ शरीर में उत्पन्न होता है, तो वह प्लाज्मा में पहुँच जाता है, जिसकी जाँच कर चिकित्सक रोग की पहचान कर लेते हैं

रक्त कोशिकाएँ (Blood Corpuscles)

रक्त में तीन प्रकार की कोशिकाएँ- लाल रक्त कोशिकाएँ (WBC) तथा प्लेटलेट्स (Platelets) मौजूद रहता है । इन रक्त कोशिकाओं का निर्माण जन्म से लेकर वयस्कता तक में अस्थि मज्जा में होता है

1. लाल रक्त कोशिकाएँ (Red Blood Corpuscles or RBC)

रक्त में सर्वाधिक मात्रा में RBC ही पाये जाते हैं । इनकी संख्या 40-50 लाख प्रति घन मिली मीटर (45-50 लाख/ 1mm³) होता है । पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में RBC की मात्रा थोड़ी कम होती है । इस कोशिका की आकृति उभय अवतल (Bioconcave) होता है, जिसका औसत व्यास 7 μm एवं मोटाई 2 μm होता है । RBC के जीवद्रव्य में राहबोसोम के अतिरिक्त कोई अन्य कोशिका अंगक नहीं पाये जाते हैं अर्थात् इस कोशिका में केन्द्रक तथा माइटोकॉन्ड्रिया का भी अभाव होता है । RBC का निर्माण अस्थि मज्जा में होता है एवं 90 से 120 दिनों के बाद इसका विनाश प्लीलहा में होता है । इसके उत्पत्ति एवं विनाश का क्रम जीवनभर चलता रहता है । मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 30 लाख RBC का निर्माण होता है और इतने ही मात्रा में नष्ट होते रहता है । लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) के जीवद्रव्य में लौह युक्त प्रोटीन हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जिसके कारण इन कोशिकाओं का रंग लाल होता है एवं इनमें O₂ (ऑक्सीजन) लेने तथा देने की क्षमता होती है । रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12-16 g/100 ml होता है । हीमोग्लोबिन कोई एंजाइम नहीं है परंतु इसकी संरचना एंजाइम से मिलती है । हीमोग्लोबिन दो भागों से मिलकर बना है । इसका प्रथम भाग हीमेटीन या हीम कहलाता है जो एक आयरन फॉरफाइरीन है । हीमोग्लोबिन का 95 प्रतिशत भाग रंगहीन प्रोटीन ग्लोबिन का बना है । हीमोग्लोबिन का एक ग्राम 1.3 मिली लीटर ऑक्सीजन से योग्य करने की क्षमता रखता है । RBC को Erythrocytes भी कहा जाता है

2. श्वेत रक्त कोशिकाएँ (White Blood Corpuscles or WBC)

WBC रक्त में सबसे कम संख्या में पायी जाने वाली कोशिका है । इनकी संख्या 6000 - 10000 प्रति घन मिलीमीटर होता है । इस कोशिका का आकार अनियमित होता है । इसमें केन्द्रक उपस्थित रहते हैं लेकिन इसमें हीमोग्लोबिन नहीं पाया जाता है, जिसके कारण ये कोशिका रंगहीन होता है । रक्त में कुछ WBC के जीवद्रव्य में सूक्ष्म कण पाये जाते हैं, ऐसे WBC ग्रेनुलोसाइट कहलाते हैं । ये तीन प्रकार के होते हैं- न्यूट्रोफिल्स (उदासीन), इओसिनोफिल (अम्लीय) तथा बेसोफिल (क्षारीय) । जिस WBC के जीवद्रव्य में कोई सूक्ष्म कण नहीं पाये जाते हैं उसे एग्रेनुलोसाइट कहा जाता है । यह दो प्रकार के होते हैं- लिम्फोसाइट तथा मोनोसाइट । विभिन्न प्रकार के WBC की औसत प्रतिशत मात्रा-

शरीर में रोग फैलाने वाला जीवाणुओं को नष्ट करना WBC का प्रधान कार्य है । विभिन्न जीवाणुओं के संक्रमण में पहले न्यूट्रोफिल और बाद में मोनोसाइट जीवाणु को नष्ट करने का कार्य करते हैं । शरीर में संक्रमण होने पर रक्त में न्यूट्रोफिल तथा मोनोसाइट्स की मात्रा बढ़ जाती है । शरीर में नोचने-खुजली, दमा तथा खासी जैसे एलर्जी का संक्रमण होने पर एसीडोफिल सुरक्षा प्रदान करता है । एलर्जी युक्त प्रतिक्रियाओं में एसीडोफिल की मात्रा बढ़ जाती है । लिम्फोसाइट्स, WBC का सबसे महत्वपूर्ण घटक है यह दो प्रकार के होते हैं- B-लिम्फोसाइट तथा T-लिम्फोसाइट । लिम्फोसाइट अलग-अलग रोगों से लड़ने के लिए अलग-अलग प्रकार के एंटीबॉडी (Antibody) का निर्माण करते हैं और शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । ग्रेनुलोसाइट WBC का निर्माण अस्थिमज्जा में होता है जबकि एग्रेनुलोसाइट WBC का निर्माण लिम्फनोड में होता है । लिम्फोसाइट का निर्माण लिम्फनोड के अतिरिक्त प्लीलहा, थाइमस ग्रंथि तथा अस्थिमज्जा में भी होता है । सभी प्रकार के WBC में मोनोसाइट सबसे बड़ा तथा लिम्फोसाइट सबसे छोटा कोशिका है । विभिन्न प्रकार के WBC का जीवन काल 1 से 4 दिनों से लेकर 13 से 20 दिनों तक का होता है । WBC कोशिका को Leucocytes भी कहा जाता है

3. प्लेटलेट्स (Platelets)

रक्त में इनकी संख्या 1,5 से 3 लाख प्रतिघन मिलीमीटर होता है । ये रक्त कोशिकाएँ केवल स्तनधारी के शरीर में ही पाया जाता है । इस कोशिका अनियमित आकृति का होता है, जिसका व्यास 2-4 μm का होता है । इसमें केन्द्रक का अभाव होता है । इस कोशिका प्रधान कार्य है रूधिर-स्त्राव के समय रक्त का थक्का बनाना । शरीर के किसी अंग के कट फट जाने से प्लेटलेट्स अधिक संख्या में एकत्र होकर आपस में चिपक जाते हैं तथा रक्त-स्त्राव को बंद कर देते हैं । प्लेटलेट्स कोशिका को Thrombocytes भी कहा जाता है

रक्त का जमना (Blood Clotting)

रक्त-स्त्राव के समय रक्त का जमना या थक्का बनना एक जटिल रसायनिक प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया में कुल 12 कारकों का उपयोग होता है जिन्हें I-XII तक अंक दिये गये हैं । इन 12 कारकों में कारक VI का कोई योगदान नहीं होता जबकि कारक VIII के अभाव में किसी भी परिस्थिति में थक्का नहीं बनता । रक्त का जमाव निम्नलिखित चरणों में क्रमिक रूप से होता है- रक्त स्त्राव होने पर सर्वप्रथम प्लेटलेट्स हवा के संपर्क में आते हैं तथा थ्रोम्बोप्लास्टिन नामक पदार्थ का निर्माण करते हैं । थ्रोम्बोप्लास्टिन रक्त में पाये जाने वाले हिपेरिन को निष्क्रिय कर देता है । हिपेरिन एक थक्का विरोधी रसायन है जो रक्त को जमने नहीं देता है । शरीर के भीतर रक्त हिपेरिन की उपस्थिति के कारण ही नहीं जमता है । इसके बाद थ्रोम्बोप्लास्टिन, विटामिन K तथा कैल्सियम आयन के साथ मिलकर रक्त में पाये जाने वाले निष्क्रिय प्रोथाम्बिन एंजाइम को सक्रिय थाम्बिन एंजाइम में परिवर्तित कर देता है । थाम्बिन रूधिर में पाये जाने वाले फाइब्रिनोजन प्रोटीन को फाइब्रिन में बदल देता है । फाइब्रिन एक प्रकार का जाल है जिसमें रक्त-कोशिकाएँ फँस जाता है, जिससे रक्त का थक्का बन जाता है जो रक्त-स्त्राव को रोक देता है । कुछ समय बाद फाइब्रिन तंतु के संकुचित होने पर पीला द्रव बाहर आता है । इसे सीरम कहते हैं । रक्त को थक्का बनने में 5 मिनट से लेकर 10 मिनट तक का समय लगता है । रक्त-चूषक मच्छड़ तथा खटमल के लार में थक्का विरोधी रसायन पाया जाता है, जिसके कारण इन जीवों द्वारा रक्त-चूषने के समय रक्त का थक्का नहीं बनता है । जोक में हिरूडीन नामक थक्का विरोधी रसायन पाया जाता है । प्रयोगशाला तथा रक्त बैंक में रक्त का थक्का बनने से रोकने हेतु 0.01 प्रतिशत सोडियम साइट्रेट या सोडियम ऑक्जेलेट रक्त में मिला दिया जाता है

रक्त-समूह (Blood Group)

सर्वप्रथम कार्ल लैंडस्टीनर ने यह पता लगाया कि सभी मनुष्य का रक्त एक समान नहीं है । मनुष्य के रक्त में पाये जाने वाले विभिन्नता का कारण इसमें पाये जाने वाले विशेष प्रकार के प्रोटीन-एंटीजन तथा एंटीबॉडी है । मानव के लाल रक्त कण (RBC) के झिल्ली में दो प्रकार के एंटीजन होते हैं जिन्हें एंटीजन A तथा एंटीजन B कहते हैं । एंटीजन को एग्लुटिनोजेंस भी कहा जाता है । यह एंटीजन ऐसे पदार्थ है जो हमारे शरीर में एंटीबॉडी निर्माण को बढ़ावा देते हैं । किसी मनुष्य में केवल एक प्रकार के एंटीजन या दोनों प्रकार के एंटीजन पाये जा सकते हैं या दोनों प्रकार के एंटीजन अनुपस्थित भी रह सकता है । रक्त के प्लाज्मा में दो प्रकार के एंटीबॉडीज होते हैं जिसे Anti A या a तथा Anti B या b कहा जाता है । एंटीबॉडी को एग्लुटिनिन्स भी कहा जाता है । रक्त में उपस्थित एंटीजन तथा एंटीबॉडी के आधार पर लैंडस्टीनर ने मानव रक्त को चार समूहों में बाँटा-

रक्त वर्ग विवरण
Blood Group Atigen Antigody
AAb
BBa
ABA तथा BNone
ONonea तथा b

उपर्युक्त चार रूधिर वर्ग में से A, B तथा O की खोज कार्ल लैंडस्टीनर ने 1901 में किया था तथा रूधिर वर्ग AB की खोज डीकैस्टेलो तथा स्टर्ली ने 1902 में किया था । रूधिर वर्ग AB में दोनों एंटीजन उपस्थित रहता है परंतु कोई एंटीबॉडी नहीं पाये जाते हैं । रूधिर वर्ग O में कोई एंटीजन नहीं पाया जाता है परंतु दोनों एंटीबॉडी पाये जाते हैं । रूधिर-वर्ग का सर्वाधिक महत्व रूधिर-आधान (Blood transfusion) के समय होता है । वर्तमान में मनुष्य के रूधिर वर्ग जाँच कर लैंडस्टीनर के नियमसार रोगियों को रूधिर चढ़ाया जाता है । रूधिर आधान हेतु लैंडस्टीनर का नियम-

रक्त आधान नियम
Blood Group किस रक्त वर्ग को रक्त दिया जा सकता है। किस रक्त वर्ग से रक्त से ग्रहण किया जा सकता है।
AA तथा ABO तथा A
BB तथा ABO तथा B
ABकेवल ABसभी रक्त वर्ग
Oसभी रक्त वर्गकेवल O

अगर रक्त ग्रहण करने वाले व्यक्ति में एंटीजन तथा एंटीबॉडी एक-दूसरे के अनुरूप (Antigen A-Antibody a या Antigen B d-Antibodyb) हो जाता है तो रक्त का अभिसंलेषण (Agglutination) हो जाता है, जिसके कारण रूधिर जम जाता है तथा व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है । Blood group O वाले व्यक्ति के रक्त में कोई एंटीजन नहीं होने के कारण, इनका रक्त सभी Blood group वाले व्यक्तियों को चढ़ाया जा सकता है । परंतु O वर्ग के व्यक्ति में दोनों एंटीबॉडी के उपस्थिति के कारण किसी अन्य Blood group का रक्त, इस वर्ग के व्यक्ति को नहीं चढ़ाया जा सकता है । इसलिए O Blood group को सर्वदाता (Universal donor) कहा जाता है । Blood group AB वाले मनुष्य में दोनों एंटीजन की उपस्थिति के कारण इनका रक्त अन्य किसी Blood group वाले व्यक्ति को नहीं चढ़ाया जा सकता है । परंतु, Blood group AB में दोनों एंटीबॉडी के अनुपस्थित के कारण इसे सभी Blood group का रक्त चढ़ाया जा सकता है । इस कारण Blood group AB को सर्वग्राही (Universal recipient) कहा जाता है

रूधिर वर्गों की वंशागति (Heredity of Blood group)

मानव को चार प्रकार के रक्त-वर्ग का निर्धारण हेतु तीन जीन/एलील होते हैं, जिसे Iᴬ, Iᴮ तथा I⁰ में व्यक्त किया जाता है । Iᴬ तथा Iᴮ प्रभावी जीन है तथा I⁰ अप्रभावी जीन है । किसी मनुष्य में उपर्युक्त तीन जीन में केवल दो ही उपस्थित रहते हैं जिससे उसके रक्त-वर्ग का निर्धारण होता है । मानव के चारों रक्त-वर्ग का जीनोटाइप-

GenotypeBlood group
IᴬIᴬ या IᴬI⁰A
IᴮIᴮ या IᴮI⁰B
IᴬIᴮAB
I⁰I⁰O

मानव में रक्त वर्ग की वंशागति-

Blood groupसंतानों के संभावित Blood group
A × AA या O
A × BA, B, AB या O
A × ABA, B, AB
A × OA या O
B × BB या O
B × ABA, B, AB
B × OB या O
AB × ABA, B, AB
AB × OA या B
O × OB या O

मानव रक्त वर्ग बहुलिकता (Multiple allele) को दर्शाता है तथा रक्त वर्ग AB सहप्रभाविता (Co-dominance) को दर्शाता है

Rh कारक या Rh रक्त वर्ग (RH-Factor or RH Blood Group)

RH Factor एंटीजन है जिसका खोज सबसे पहले लैंडस्टीनर एवं वीनर ने मक्का रीसस बंदर में 1940 किया । Rh Factor एंटीजन विश्व के लगभग 87 प्रतिशत मनुष्य में Rh एंटीजन पाया जाता है । जिन मनुष्य में RH एंटीजन पाया जाता है उसका रक्त वर्ग RH⁺ (Positive) तथा जिन मनुष्य में यह एंटीजन नहीं पाया जाता है उसका रक्त वर्ग RH⁻ (Negative) कहलाता है । रूधिर आधान के समय अगर RH⁻ व्यक्ति को RH⁺ व्यक्ति का रक्त चढ़ाया जाता है तो ग्राही व्यक्ति के रक्त में RH⁺ एंटीजन के विरुद्ध एंटीबॉडी का निर्माण शुरू हो जाता है, लेकिन पहली बार इस तरह के रक्त आधान में कोई समस्या नहीं आती है । लेकिन प्रथम रूधिर आधान के पश्चात् यदि RH⁺ व्यक्ति का रक्त RH⁻ व्यक्ति में पुनः दिया जाये तो RH⁺ एंटीजन के साथ ग्राही व्यक्ति के शरीर में निर्मित एंटीबॉडी प्रतिक्रिया करता है जिसमें ग्राही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है । उपर्युक्त कारणों से RH⁻ व्यक्ति को RH⁺ व्यक्ति का रक्त पूरे जीवन काल में केवल एक बार चढ़ाया जा सकता है दो बार नहीं

RH कारक की वंशागति-

पितामाताउत्पन्न संतान
RH⁺RH⁺RH⁺
RH⁻RH⁺RH⁺
RH⁻RH⁻RH⁻
RH⁺RH⁻RH⁺

एरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटैलिस (Erythnblastosis Fetallis)

एरिथ्रोब्लास्टोसिस Rh कारक से संबंधित रोग है जो केवल गर्भ में पल रहे शिशुओं को होता है । इस रोग के कारण गर्भ में ही शिशु की मृत्यु हो जाती है । अगर Rh⁺ पुरुष का विवाह Rh⁻ स्त्री के साथ होता है, तो इस जोड़े से उत्पन्न सभी शिशु Rh⁺ वाले होते हैं । शिशु अपने माँ के गर्भाशय में Rh⁺ रूधिर कोशिका बनाने लगता है जो उसके माँ के शरीर में पहुँच जाता है । माँ का रूधिर शिशु के Rh⁺ एंटीजन के विरुद्ध एंटीबॉडी बनाने लगता है जो शिशु के रक्त-कोशिकाओं को तोड़ने लगता है जिसके कारण गर्भावस्था में ही शिशु की मृत्यु हो जाती है । प्रथम गर्भावस्था में माँ का रक्त एंटीबॉडी धीरे-धीरे बनाता है जिसके कारण प्रथम गर्भ के शिशु को विशेष हानि नहीं होती है परंतु ऐसे शिशु के जन्म होने से इसमें अनियमित संरचना, बुद्धिहीनता आदि जैसे लक्षण रहते हैं । लेकिन दूसरे गर्भावस्था में शिशु की मृत्यु पर्याप्त एंटीबॉडी बन जाने से निश्चित ही हो जाएगी । उपर्युक्त कारणों से Rh⁺ पुरुष तथा Rh⁻ महिला विवाह करते हैं तो ऐसे जोड़े संतान उत्पन्न नहीं कर सकते हैं । इस रोग के उपचार हेतु रक्त प्लाज्मा से तैयार 'इम्यूनोग्लोबिन (IgG)' माता के रक्त में इंजेक्ट की जाती है । यह इम्यूनोग्लोबिन उस Rh⁺ एंटीजन को नष्ट करता है जो शिशु के रक्त से प्लीलहा के माध्यम से माता को रक्त में प्रवेश करता है

लासिका-तंत्र (Lymphatic system)

शरीर के विभिन्न उत्तक तथा मांसपेशियों के बीच कुछ स्थान खाली रहते हैं, जिनमें नलीनुमा रचना एवं गाँठें उपस्थित रहते हैं । इस नलीनुमा रचना एवं गाँठ को लासिका नलियाँ और लिम्फनोड कहा जाता है । रक्त प्लाजा जब रूधिर कोशिकाओं (Blood Capillaries) से गुजरता है तब कुछ रक्त प्लाजा कोशिकाओं के पतली दिवार से छनकर लासिका नली तथा लिम्फनोड में जमा हो जाते हैं, जिसका लासिका (lymph) कहा जाता है । लासिका में कम मात्रा में प्रोटीन, वसा, लवण पाये जाते हैं तथा इसमें लिम्फोसाइट श्वेत रक्त कोशिका (WBC) भी उपस्थित रहते हैं । लासिका में ऑक्सीजन तथा ग्लूकोज की बहुत कम मात्रा पायी जाती है परंतु इसमें काफी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उपस्थित रहते हैं । लासिका नली, लिम्फनोड तथा लासिका मिलकर लासिका-तंत्र का निर्माण करते हैं । लासिका-तंत्र का हृदय से कोई संबंध नहीं होता है । लासिका, कोशिका तथा उत्तक से CO₂ तथा अन्य हानिकारक पदार्थ लेकर रक्त में पहुँचाता है तथा रक्त इन्हें गंतव्य स्थान तक पहुँचा देते हैं । लासिका को उत्तक द्रव्य (tissue fluid) भी कहा जाता है । इसमें WBC पाया जाता है परंतु RBC अनुपस्थित रहता है, जिसेक कारण यह रक्त के तरह लाल न होकर रंगहीन होता है