🌱 परिचय (Introduction)

श्वसन के प्रकार (Types of Respiration)

कोशिकाओं में होने वाला श्वसन दो प्रकार के होते हैं- वायवीय (ऑक्सी) श्वसन तथा अवायवीय (अनॉक्सी) श्वसन।

1. अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration)

  • यदि कोशिका में ऑक्सीजन के अनुपस्थिति में ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होकर ATP बनता है तो इसे अवायवीय श्वसन कहते हैं।
  • अगर कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया नहीं हो तो उस स्थिति में भी अवायवीय श्वसन ही होते है। प्रोकैरियोटीक कोशिका से बने जीव जैसे- जीवाणु में माइटोकॉण्ड्रिया नहीं होते हैं, उन जीवों में अवायवीय श्वसन ही होती है।
  • जीवाणु तथा पौधे के कोशिका में अवायवीय श्वसन होने पर इथाइल-अल्कोहल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा 2ATP अणु का निर्माण होता है।
    $C_6H_{12}O_6 \xrightarrow{O_2 \text{ की अनुपस्थिति}} 2C_2H_5OH + 2CO_2 + 2ATP$
  • जीवाणु के कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया नहीं होते हैं, अतः इसमें हमेशा अवायवीय श्वसन ही होता है। पौधे के कोशिका में अवायवीय श्वसन उस स्थिति में होता है जब पौधों के कोशिका में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
  • जंतुओं तथा मानव के कोशिका में भी जब कभी ऑक्सीजन की कमी पड़ जाती है, तब कोशिका में अवायवीय श्वसन शुरू हो जाता है। जंतुओं तथा मानव में अवायवीय श्वसन होने पर लैक्टिक अम्ल तथा 2ATP ऊर्जा उत्पन्न होते है।
    $C_6H_{12}O_6 \xrightarrow{O_2 \text{ की अनुपस्थिति}} 2C_3H_6O_3 + 2ATP$
  • जब व्यक्ति अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करता है अथवा जल्दी-जल्दी कार्य करता है, इस स्थिति में पेशी कोशिकाओं में पर्याप्त ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं हो पाती है, जिसके कारण पेशी कोशिकाओं में अवायवीय श्वसन शुरू के कारण पेशी कोशिका में लैक्टिक अम्ल बनता है जो पेशीय जकड़न या ऐंठन उत्पन्न करता है।

2. वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)

  • वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है, इसके अतिरिक्त वायवीय श्वसन हेतु कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया का होना अनिवार्य है।
  • वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया के मदद से सम्पन्न होता है। वायवीय श्वसन के दौरान ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिसके फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा 38ATP अणु का निर्माण होता है।
    $C_6H_{12}O_6 \rightarrow 6CO_2 + 6O_2 + 38ATP$

🔄 श्वसन अभिक्रिया (Respiration Reactions)

कोशिका में दो महत्वपूर्ण अभिक्रिया के बाद श्वसन सम्पन्न होता है। सर्वप्रथम ग्लाइकोलाइसिस अभिक्रिया होती है उसके बाद क्रेब्स-चक्र अभिक्रिया होता है।

1. ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis)

  • श्वसन के दौरान सर्वप्रथम गलाइकोलाइसिस होता है। यह अभिक्रिया कोशिका के कोशिका द्रव में सम्पन्न होता है।
  • ग्लाइकोसिस में ग्लूकोज अणु का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है जिसके फलस्वरूप पायरूविक अम्ल तथा 2ATP ऊर्जा बनता है।
    $C_6H_{12}O_6 \rightarrow 2C_3H_4O_3 + 4[H] + 2ATP$
  • ग्लाइकोलाइसिस में चार हाइड्रोजन परमाणु भी बनते है। यह H-परमाणु माइटोकॉण्ड्रिया में जाकर 6ATP ऊर्जा बनाने में सक्षम होता है परन्तु माइटोकॉण्ड्रिया कोशिका में नहीं रहने पर यह H-परमाणु इथाइल ऐल्कोहॉल या लैक्टिक अम्ल बनने में खर्च हो जाता है।

2. क्रेब्स-साइकिल (Krebs-cycle)

  • इस अभिक्रिया की खोज हेन्स क्रेब्स ने किया था जिसके कारण इसे क्रेब्स साइकिल कहा जाता है। यह अभिक्रिया या साइकिल कोशिका के माइटोकॉण्ड्रिया में होता है। माइटोकॉण्ड्रिया की अनुपस्थिति में क्रेब्स-साइकिल नहीं हो सकता है।
  • क्रेब्स साइकिल में ग्लाइकोलाइसिस के दौरान बने पायरूवेट अम्ल का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है तथा प्रत्येक पायरूविक अम्ल से 15ATP ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
  • एक ग्लूकोज अणु से दो अणु पायरूविक अम्ल ग्लाइकोसिस के दौरान बना था। अतः क्रेब्स-साइकिल में दो पायरूविक अम्ल से 30ATP ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • ग्लाइकोलाइसिस तथा क्रेब्स साइकिल के उपरांत श्वसन सम्पन्न हो जाता है और 1-glucose अणु से 38ATP ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • Note: ग्लाइकोसिस तथा क्रेब्स साइकिल का चर्चा यहाँ संक्षिप्त रूप से की गई है। विस्तारपूर्वक जानने हेतु NCERT Class-11th का जीवविज्ञान पुस्तक देखें।

⚖️ वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अंतर

क्र.सं. वायवीय श्वसन (Aerobic) अवायवीय श्वसन (Anaerobic)
1 वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही संभव है। अवायवीय श्वसन में ऑक्सीजन की कोई आवश्यकता नहीं है।
2 कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया का होना अनिवार्य है। कोशिका के कोशिकाद्रव्य में ही सम्पन्न हो जाती है।
3 ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है। ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है।
4 ग्लूकोज ऑक्सीकृत होकर कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल बनाते हैं। ग्लूकोज इथाइल ऐल्कोहॉल या लैक्टिक अम्ल बनाते है।
5 एक ग्लूकोज अणु 38ATP ऊर्जा निर्माण कर सकता है। एक ग्लूकोज अणु से केवल 2ATP ऊर्जा का ही निर्माण होता है।
6 ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रेब्स साइकिल दोनों होते हैं। केवल ग्लाइकोलाइसिस होता है।

📈 श्वसन-भागफल (Respiratory – Quotient)

🌬️ बाह्य-श्वसन (External Respiration)

पौधों तथा जन्तु में मुख्य रूप से वायवीय श्वसन पाये जाते है। वायवीय श्वसन में साँस लेने तथा साँस छोड़ने की प्रक्रिया होती है, जिसे बाह्य श्वसन कहा जाता है। बाह्य श्वसन पौधे तथा जन्तुओं में अलग-अलग तरीके से होते है।

🌿 पौधो में बाह्य श्वसन

  • पौधों में श्वसन गैसों का आदान-प्रदान शरीर के सतह द्वारा विसरण क्रिया द्वारा होता है। पौधे विसरण विधि द्वारा वायुमंडल से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासित करते है। पौधों का सभी भाग अलग-अलग श्वसन करते है।
  • पौधे की जड़े में पाया जाने वाला मूलरोम मिट्टी के कणों से बीच फँसे वायु से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड मिट्टी में ही छोड़ देते है।
  • जलीय पौधे जल में घुले ऑक्सीजन को विसरण विधि द्वारा प्राप्त करते है तथा जल में ही कार्बन डाइऑक्साइड का त्याग कर देते है।
  • बड़े पौधे के तना में श्वसन गैस ($O_2$ तथा $CO_2$) का आदान-प्रदान हेतु वातरन्ध्र (lenticels) पाये जाते है। छोटे या शाकीय पौधे के तना में वातरंध्र का अभाव होता है, इन पौधों के तना में गैसीय आदान-प्रदान हेतु रंध्र (Stomata) पाये जाते है।
  • पौधों की पत्तियों में श्वसन गैसों का आदान-प्रदान रंध्र (Stomata) के द्वारा होता है।
  • पौधा की पत्तियाँ दिन में श्वसन हेतु वातावरण से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं करता है क्योंकि दिन में पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन का निर्माण होते रहता है, लेकिन पत्तियाँ रात में श्वसन हेतु वातवरण से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं क्योंकि रात में प्रकाश संश्लेषण नहीं होने ऑक्सीजन का निर्माण नहीं होता है।

पौधों में होने वाले बाह्य श्वसन की तीन प्रमुख विशेषताएँ-

  1. पौधों के सभी भाग, जड़, तना, पत्ती अलग-अलग श्वसन करते है।
  2. पौधों में श्वसन गैसों का विसरण नहीं होता है, इसके विपरित जंतुओं या मानव में श्वसन गैसों का विसरण होता है।
  3. पौधों को जीवन-यापन हेतु कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है इसलिए पौधों में जंतुओं की अपेक्षा श्वसन की गति धीमी होती है।

🐾 विभिन्न प्रकार के जंतुओं में बाह्य श्वसन

  • मोनेरा तथा प्रोटिस्टा समुदाय के एक कोशिकीय जीवों में श्वसन गैस ($O_2$ तथा $CO_2$) का आदान-प्रदान कोशिका झिल्ली से विसरण विधि द्वारा होता है। मोनेरा समुदाय के जीवों में केवल अवायवीय श्वसन होता है, जिसके कारण उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत नहीं होती है।
  • पोरीफेरा (स्पंज) तथा सीलेंटरेटा/निडेरिया (हाइड्रा) संघ के जीवों में भी श्वसन गैसों का आदान-प्रदान शरीर के सतह से विसरण विधि द्वारा होता है।
  • कीट तथा मकड़ी वर्ग के जीवों में श्वसन गैसों का आदान-प्रदान हेतु विशेष अंग पाये जाते हैं जिसे ट्रेकिया (Trachea) कहते है। ट्रेकिया एक नली (Tube) समान रचना होती है जिसका एक सिरा शरीर के अंदर सीधे उत्तकों से जुड़ा रहता है तथा दूसरा सिरा शरीर के सतह पर एक छिद्र आकार के संरचना के रूप में खुलती है। इस छिद्र को श्वासंरध्र (spiracle) कहते है। श्वासंरध्र छिद्र से ही वायुमंडलीय गैस ट्रेकिया में प्रवेश करते हैं तथा सीधे उत्तकों की कोशिका में पहुँचते है।
  • मछली जैसे जलीय जीवों में बाह्य-श्वसन हेतु क्लोम (gills) नामक संरचना होती है। गिल्स, जल में घुले हुए ऑक्सीजन का उपयोग श्वसन हेतु करत है। गिल्स केवल जलीय श्वसन हेतु उपयुक्त है, इस संरचना द्वारा जीव वायुमंडलीय गैसों का उपयोग नहीं कर सकते है।
  • कीचड़ युक्त तलाबो में रहने वाले कुछ मछलियाँ, जैसे- गरई, सिंघी, कवई, मांगुर आदि में गिल्स के अतिरिक्त, सहायक श्वसन अंग पाये जाते है। सहायक श्वसन अंग से ये मछली वायुमंडल ऑक्सीजन को ग्रहण करने में सक्षम होता है और यही कारण है ये मछलियाँ ज्यादा समय तक पानी के बाहर जिंदा रहती है।
  • स्तनधारी (Human) में बाह्य श्वसन को सम्पन्न कराने हेतु एक विकसित श्वसन-तंत्र (Respiratory system) पाये जाते हैं, जिससे फेफड़े (lungs) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।

🫁 मनुष्य का श्वसन-तंत्र (Respiratory System of Human Body)

  • मानव के श्वसन तंत्र का प्रारंभ एक जोड़े नासिक रंध्र (Nostril or Nares) से होता है। नासिक रंध्र मुख के ठीक ऊपर लगभग गोलाकार आकृति की होती है।
  • दोनों ही नासिका रंध्र भीतर की ओर अलग-अलग नासिका वेश्म (Nasal chamber) में खुलती है। दो नासिका वेश्म के बीच एक लंबी अस्थि होती है जिसे नासा-अस्थि (Nasal septum) कहते है।
  • नासिका वेश्म (Nasal chamber) के अग्र भाग में रोमयुक्त त्वचा (hairy skin) पाये जाते हैं जिसमें श्लेषा (mucous) लगे होते है। नासिका वेश्म की यह रोम युक्त त्वचा हवा के धूलकण को हवा से छानकर अलग कर देती है।
  • नासिका वेश्म के पिछले भाग में संवेदी कोशिका पाये जाते हैं जिनके द्वारा हवा के सुगंध द्वारा दुर्गंध का पता चलता है। इस क्षेत्र को घ्राण क्षेत्र (Olfactory region) तथा श्वसन क्षेत्र (Respiratory region) भी कहा जाता है।
  • नासिका वेश्म मुखगुहा के पीछे ग्रसनी (Pharynx) में खुलता है। ग्रसनी से श्वसन मार्ग का प्रारंभ कंठ द्वारा (glottis) से शुरू होता है। ग्लोटिस के ऊपर एपीग्लॉटिस नाम का ढक्कन पाया जाता है। जैसे ही हवा ग्रसनी में पहुँचता है, एपीग्लॉटिस, ग्लोटिस के ऊपर से हट जाता है तथा हवा ग्लोटिस से होकर श्वसन-मार्ग के अगले हिस्से में पहुँच जाती है।
  • ग्लोटिस, उपास्थि (Cartilage) की बनी संरचना है जो गले पर उभार की तरह दिखती है। गले के इस उभार को एडम्स ऐपल (Adam's apple) कहा जाता है। एडम्स ऐपल नर मानव (Male Human) में ही वयस्क होने के बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देते है।
  • ग्लोटिस के पीछे स्वर तंत्र (Larynx) पाया जाता है, जिसमें ध्वनि की उत्पत्ति हेतु कंपनशील स्वर झिल्ली (Vocal cord) पाया जाता है। मनुष्य का आवाज लैरिंक्स से ही निकलता है। इस संरचना को मानव का Sound-Box कहा जाता है।
  • लैरिंक्स पीछे की ओर श्वासनली (Trachea) में खुलता है। मानव का ट्रैकि‍या लगभग 12 cm लंबी होती है और इसका व्यास लगभग 16 mm होता है।
  • ट्रेकिया नली की दिवार पतली तथा कमजोर होती है, इसे मजबूती देने हेतु ट्रेकिया की पूरी लंबाई में उपास्थि के बने अर्धवलय संरचना पायी जाती है।
  • ट्रेकिया, गर्दन को पार कर छाती वाले हिस्से में पहुँचकर दो भागों में विभक्त हो जाती है, इन दोनों भाग को ब्रोंकाई (Bronchi) कहते है। ब्रोंकाई के ऊपर उपास्थि के बने पूर्ण वलय उपस्थित रहते है। दोनों ही ब्रोकाई बाएँ-दाँय हिस्सों में बँटकर फेफड़ा (lungs) में प्रवेश कर जाती है।
  • फेफड़ा मनुष्य के वक्षगुहा (Thoracic cavity) में स्थित स्पंजी, गुलाबी तथा थैलीनुमा संरचना है। फेफड़ों की संख्या दो होती है, बायीं ओर की ओर फेफड़ा दो थैलियों से युक्त और दायी ओर एक बड़ी और दो छोटी थैली युक्त संरचना में बँटी रहती है।
  • फेफड़ा वक्षगुहा के जिस भाग में स्थित होती है उसे प्लूरल गुहा (Plural cavity) कहते हैं। प्लूरल गुहा के चारों ओर झिल्लीयों का पतला आवरण रहता है जिसे पेराइटल प्लूरा (Parietal pleura) कहा जाता है।
  • ब्रोंकाई (Bronchi) फेफड़ों में प्रवेश कर अनेक छोटी नलियों में विभक्त हो जाती है जिसे ब्रोंकिओल्स (Bronchioles) कहते है। पुनः ब्रोंकिओल्स कई शाखाओं में विभक्त होती है जिन्हें वायुकोष्ठ वाहिनी (Alveolar duct) कहते है। प्रत्येक वायुकोष्ठ वाहिनी वायुकोष (airsac or Alveoli) पर आकर समाप्त हो जाती है।
  • श्वसन मार्ग के प्रारंभ नासिका रंध्र से होता है तथा वायुकोष्ठ पर आकर समाप्त हो जाता है। दोनों फेफड़ों में $3 \times 10^8$ वायुकोष पाये जाते हैं तथा फेफड़ों में 400 से 800 वर्गफीट सतह श्वसन गैसों ($O_2$ तथा $CO_2$) के आदान-प्रदान के लिए उपलब्ध रहता है।
  • फेफड़ों के प्रत्येक वायुकोष्ठ के चारों ओर बहुत ही महीन रक्त वाहिकाओं (Blood Capillaries) मौजूद रहती है, जिनमें रक्त भरा रहता है। वायुकोष्ठ में ही हवा का ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करते हैं तथा रक्त का कार्बनडाइऑक्साइड, रक्त से बाहर निकल आते है।
  • वायुकोष्ठ तथा अशुद्ध रक्त ($CO_2$ युक्त रक्त) के बीच श्वसन गैसों का आदान-प्रदान विसरण विधि द्वारा होती है। विसरण क्रिया श्वसन गैसों के दाबों में अंतर होने के कारण सम्पन्न होता है-
विशेषता वायुकोष्ठ (Alveolus) अशुद्ध रक्त (Impure Blood)
ऑक्सीजन
प्रतिशत मात्रा 15-16 -
औसत दाब 114-121 mm 60-66mm
कार्बन डाइऑक्साइड
प्रतिशत मात्रा 4-5 -
औसत दाब 30-38 mm 40-46mm

*(नोट: ऑक्सीजन का विसरण वायुकोष्ठ से अशुद्ध रक्त की ओर होता है, तथा कार्बन डाइऑक्साइड अशुद्ध रक्त से वायुकोष्ठ की ओर विसरित होती है)।*

⚙️ श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of Respiration)

श्वसन या बाह्य श्वसन की पूरी प्रक्रिया दो अवस्थाओं में सम्पन्न होती है। यह दो अवस्थाएँ है- प्रश्वास (Inspiration) तथा उच्छ्वास (Expiration)

1. प्रश्वास (Inspiration) या साँस लेना

  • इस प्रक्रिया में हवा नासिका रंध्र से वायु-मार्ग होते हुए वायुकोष्ठ में पहुँचती है।
  • साँस लेत समय डायफ्राम पीछे की ओर खिसकता है तथा पसलियों के बीच पाये जाने वाले अन्तर्पर्शुका मांसपेशी (Intercostal Muscles) में संकुचन होता है जिससे सभी पसलियाँ फैल जाती है।
  • डायफ्राम के पीछे खिसकने तथा पसलियों के फैलने के कारण फेफड़ा भी फैल जाता है जिससे फेफड़ों में मौजूद वायु का दाब वायुमंडल में मौजूद वायु के दाब से कम हो जाता है। फलस्वरूप वायुमंडल की ऑक्सीजन युक्त वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।

2. उच्छ्वास (Expiration) या साँस छोड़ना

  • इस अवस्था में श्वसन के पश्चात् वायु उसी पथ के द्वारा बाहर निकल कर वायुमंडल में आती है, जिस पथ से वह फेफड़ों में प्रवेश किया था।
  • उच्छ्वास के दौरान डायफ्राम तथा पसलियाँ पुनः अपने स्थान पर आ जाती है जिससे फेफड़ा सिकुड़ जाती है।
  • फेफड़ों में स्वयं फैलने तथा सिकुड़ने का गुण नहीं होता है। फेफड़ों के ऊपर स्थित पसलियाँ एवं डायफ्राम के फैलने-सिकुड़ने से ही फेफड़ा फैलता-सिकुड़ता है।
  • बाह्य-श्वसन की दो अवस्था प्रश्वास तथा उच्छ्वास को सम्मिलित रूप से 'Breathing' कहते है।

प्रश्वासित, उच्छ्वासित तथा वायुकोष्ठ में हवा का रासायनिक संघटन:

गैस प्रश्वासित वायु (Inspired) उच्छ्वासित वायु (Expired) वायुकोष्ठक वायु (Alveolar)
ऑक्सीजन 21% 16% 14%
कार्बन डाइऑक्साइड 0.03% 4% 5.5%
नाइट्रोजन 78% 78% -
जलवाष्प 1.25% 6.2% 6.2%

📊 फेफड़े में वायु की मात्रा (Volume of Air in the lungs)

🩸 मानव शरीर में गैसों का परिवहन (Transport of Gases)