• एक ही जाति के जीवों द्वारा नये जीव का उत्पन्न होना प्रजनन (Reproduction) कहलाता है। प्रजनन इस पृथ्वी पर किसी जाति के बने रहने के लिए परम-आवश्यक है।
  • सजीवों में दो विधि से प्रजनन होते हैं-

    1. अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) – जब केवल एक जीव से ही नये जीव उत्पन्न होता है तो प्रजनन की ये विधि अलैंगिक कहलाती है

    2. लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) – जब नये जीव की उत्पत्ति दो विपरित लिंग के जीवों के द्वारा होती है तो यह विधि लैंगिक कहलाती है।

अलैंगिक प्रजनन के प्रकार-

1. विखंडन (Fission)

◆ विखंडन द्वारा प्रजनन एक कोशिकीय जीव प्रोटोजोआ, जीवाणु में होता है। विखंडन दो प्रकार के होते हैं-

(i) Binary Fission-

इसमें जनक जीव को कोशिका विखंडित होकर दो नये जीव को उत्पन्न करते हैं। Binary Fission में जनक जीव का अस्तित्व समाप्त हो जाता है तथा दो नये जीव आस्तित्व में आ जाते हैं।

■ अमीबा, पैरामीशियम, लीशमैनिया, जीवाणु, में Binary Fission द्वारा ही प्रजनन होता है।

(ii) Multiple Fission-

प्रतिकूल परिस्थिति में एककोशिकीय जीव (प्रोटोजोआ, जीवाणु) के कोशिका के चारों ओर एक मजबूत आवरण बन जाता है, इसे सिस्ट (Cyst) कहते हैं। सिस्ट के भीतर कोशिका का केन्द्रक कई बार विभाजित होकर संतति केन्द्रक (Dughter Nuclei) का निर्माण होता है। प्रत्येक संतति केन्द्र के चारों ओर कोशिका द्रव्य एकत्रित होती है और एकजनक कोशिका से कई कोशिका बन जाती है।

■ प्लाज्मोडियम में Multiple Fission द्वारा ही प्रजनन होता है। एक बार में प्लाज्मोडियम के एक कोशिक से 1000 नये प्लाज्मोडियम कोशिका बन जाती है।

2. मुकुलन (Budding)-

इस प्रकार के प्रजनन में, जनक जीव के शरीर का छोटा सा भाग 'मुकुल' (Bud) के रूप में उभरता है, जो कुछ समय बाद जनक जीव से अलग होकर स्वतंत्र जीव बन जाते हैं।

  • एक कोशिकीय कवक यीस्ट में तथा बहुकोशिकीय जीव हाइड्रा में मुकुलन द्वारा प्रजनन है।

3. बिजाणु जनन (Sporulation)-

निम्न श्रेणी के सजीव प्रमुख रूप से जीवाणु, शैवाल, कवक में बिजाणु जनन द्वारा प्रजनन होता है।

  • इस प्रजनन में जीव के शरीर में सूक्ष्म थैली में समान रचना बनती है, जिसे बिजाणुधानी (Sporangia) कहते हैं। बिजाणुधानी के अंदर कई छोटे-छोटे गोल बिजाणु (Spore) का निर्माण होता है। उपयुक्त समय होने पर बिजाणुधानी टूट जाता है, जिससे सभी बिजाणु बाहर आ जाते हैं और प्रत्येक बिजाणु से नये जीव का निर्माण होता है।

4. Regeneration (पुनरुद्भवन)-

कुछ जीव के शरीर दो या अधिक टुकड़े में खंडित होने पर, प्रत्येक खंडित भाग विकास कर नये जीव बन जाते हैं। प्रजनन की यह पुनरुद्भवन विधि (Regeneration) कहलाता है।

  • स्पाइरोगाइरा, हाइड्रा, प्लेनेरिया, में इस विधि द्वारा प्रजनन होता है।

5. Vegetative Reproduction (कायिक जनन)-

इस प्रकार के प्रजनन केवल पौधा में होता है। पुराने पौधों के किसी भाग (जड़, तना, पत्ती) से नये पौधों का बना कायिक जनन कहलाता है।

कायिक जनन द्वारा ही मैदान में उपस्थित घास पौधा के सूखे, पुराने तने से बारिश के बाद मैदानों में हरी घास उग आती है।

प्रमुख पौधा जिनमें कायिक जनन द्वारा प्रजनन होते हैं- पत्थरचट्टा, अमरूद, आलू, प्याज, केला, लहसून, जलकुंभी ट्यूलीप, पुदीना, स्ट्राबेरी आदि।

कृत्रिम प्रवर्धन (Artificial Propagation)- मानव निर्मित या कृत्रिम विधियों द्वारा एक पौधा से कई पौधा को उत्पन्न करने की प्रक्रिया कृत्रिम प्रवर्धन कहलाता है। कृषि क्षेत्र एवं बागवानी में इसका व्यापक स्तर पर उपयोग होता है। पौधों में कृत्रिम प्रवर्धन की तीन विधि प्रचलित है-

(i) कर्तन लगाना (Cuttings)- इस विधि से गुलाब, बोगेनवेलिया, गुलदाउदी, अंगूर, गन्ना, केला, कैक्टस को उत्पन्न किया जाता है।

(ii) दाब लगाना (Layering)- इस विधि से चमेली, स्ट्राबेरी, रसभरी, नींबू, अमरूद जैसे पौधों को उत्पन्न किया जाता है।

(iii) कलम बाँधना (Grafting)- कलम-बाँधना वह विधि है जिसमें दो भिन्न-भिन्न पौधे के कटे तने, एक जड़ सहित, दूसरा बिना जड़ वाला को एक साथ इस प्रकार संयुक्त किये जाते हैं कि दोनों तने जुड़कर नये पौधा बन जाते हैं। आम, सेब, नाशपाती, आड़ू (Peach) जैसे फल के पौधा में कलम बाँधा जाता है।

6. Tissue Culture (उत्तक संवर्धन)-

इस विधि में जीवों के शरीर से उत्तक का एक छोटा टुकड़ा काटकर उसे पोषक पदार्थ के घोल में रख दिया जाता है। अनुकूल परिस्थिति में उत्तक का टुकड़ा संगठित होकर वृद्धि करने लगता है। उत्तक के संगठित पिंड को कैलस कहते हैं। कैलस को पुनः हार्मोनयुक्त माध्यम से रखकर विकसित किया जाता है और नये जीव की उत्पत्ति होती है।

  • Tissue Culture द्वारा गुलदाउदी, शतावरी, ऑर्किड के पौधा पैदा किये जाते हैं।
  • Tissue Culture से उत्पन्न जीव क्लोन कहलाते हैं।
  • Tissue Culture द्वारा या किसी अन्य कृत्रिम विधि द्वारा एक पूर्ण प्राणी का अलैंगिक विकास करना क्लोनिंग (Cloning) कहलाता है।
  • स्कॉटलैंड के एडिन बर्ग विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले रोस्लिन इंस्टीट्यूट ने सबसे पहले डॉली नामक भेड़ का क्लोनिंग तकनीक से विकास किया। इस क्लोनिंग प्रक्रिया को इयान विलमॉट तथा कीथ कैंपबेल एवं उनके सहयोगी जीव वैज्ञानिकों ने सफलता पूर्वक पूरा किया था।
  • डॉली नामक पहला क्लोन पशु का जन्म 5 जुलाई 1996 को हुआ था। छह साल की उम्र 14 फरवरी 2003 को डॉली भेड़ की मृत्यु हो गयी। डॉली भेड़ के बाद इस तकनीक द्वारा चूहे, खरगोश, बैल, की उत्पत्ति कराई गई।
  • क्लोनिंग तकनीक का प्रयोग मनुष्य पर करना लगभग समूचे विश्व में वर्जित है।

Sexual Reproduction

जनन की वह प्रक्रिया जिसमें नये जीव उत्पन्न करने हेतु एक मादा जीव एवं एक नर जीव भाग लेते हैं, लैंगिक जनन कहलाता है।
(i) एकलिंगी (Unisexual)- जिनमें नर और मादा लिंग अलग-अलग जीवों में पाये जाते हैं एक लिंगी जीव कहलाते हैं। अधिकांश जीव एकलिंगी होते हैं। मनुष्य एकलिंगी जीव है।
(ii) द्विलिंगी (Bisexual)- जिनमें नर और मादा लिंग एक ही जीव में पाये जाते हैं, द्विलिंगी या हर्मोफ्रोडाइट कहलाते हैं। अधिकांश पौधा, केंचुआ, कृमि (Worms) हाइड्रा द्विलिंगी जीव है।

Sexual Reproduction in Plant

  • पौधा का जनन अंग फूल है। फूल तने से जिस डंठल द्वारा जुड़ा रहता है उसे Pedicel (वृंत) कहते हैं। Pedicel के ऊपर का फूला भाग Thalamus (पुष्पासन) कहलाता है। Thalamus के ऊपर फूल के सभी भाग निश्चित क्रम में व्यवस्थित रहते हैं।
  • एक पूर्ण पुष्प में चार भाग होते हैं-
    (i) Calyx (बाह्यदल पुंज)-

    यह भाग प्रकाश-संश्लेषण द्वारा ग्लूकोज का निर्माण करते हैं तथा कली अवस्था में अंदर के अंगों को सुरक्षा करता है।

    (ii) Corolla (दलपुंज)-

    पुष्प का यह भाग अक्सर रंगीन या सफेद होता है तथा कीटों को परागण के लिये आकर्षित करता है।

    ■ एक बीज पत्री (Monocot) पौधे के फूल में Calyx तथा Corolla के बीज कोई विभेद नहीं रहता है। ऐसे पुष्प के पहले तथा दूसरे भाग परिदल (tepals) कहलाता है और इसके चक्र को परिदलपुंज (Prianth) कहा जाता है।

    (iii) Androecium (पुमंग)-

    यह पुष्प का नर भाग है। यह भाग कई लंबी-लंबी रचनाओं से बनी होती है इसे Stamens (पुंकेसर) कहते हैं। प्रत्येक Stamens के दो भाग होते हैं- लंबा भाग तंतु (Filament) कहलाता है तथा अग्र भाग Anther (पराग कोश)। Anther में Pollen grain (परागकण) का विकास होता है।

    (iv) Gynoecium (जायांग)-

    यह पुष्प का मादा भाग है। यह भाग Carpels (स्त्रीकेसर) इकाई से मिलकर बना होता है। प्रत्येक Carpels के तीन भाग होते हैं सबसे नीचे फूले भाग को अंडाशय (Ovary) कहते हैं। मध्यभाग को वर्तिका (Style) तथा अग्रभाग जो थोड़ा फूली हुई तथा चिपचिपा होता है उसे वर्तिकाग्र (Stigma) कहते हैं।

  • Calyx तथा Corolla को फूल का सहायक भाग कहते हैं तथा Androecium तथा Gynoecium फूल के आवश्यक भाग है। जब फूल में सिर्फ Androecium या Gynoecium रहते हैं तो उन्हें एकलिंगी एवं दोनों की उपस्थिति होने पर उन्हें उभयलिंगी कहते हैं। अधिकांश पौधा के फूल एकलिंगी ही होते हैं।

परागण
(Pollination)

परागकोष (anther) से परागकण का निकलकर वर्तिकाग्र (Stigma) पर पहुँचने की क्रिया को परागण कहते हैं। परागण दो तरह से होता है-

(i) स्व परागण (Self-Pollination)-

जब एक ही पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र (Stigma) पर पहुँचते हो या उसी पौधे के अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हो, तो उसे स्वपरागण कहा जाता है।

■ स्व परागण केवल उभयलिंगी पौधा में ही होता है। सूर्यमुखी, बालसम पौधों में स्व परागण होता है।

(ii) पर-परागण (Cross Pollination)-

जब एक पुष्प के परागण दूसरे पौधे पर स्थित पुष्प के वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुँचते हो तो इसे पर-परागण कहते हैं।

■ अधिकांश पौधों में Pollination पर-परागण द्वारा ही होता है। पर-परागण हेतु किसी बाहरी कारक की आवश्यकता होती है जो परागकण को एक फूल के परागकोश से दूसरे फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचा दें। बाह्य कारक जिसके द्वारा प्राय: पर-परागण होता है-

वायु द्वाराAnemophilous
कीट द्वाराEntomophilous
जल द्वाराHydrophilous
जन्तु द्वाराZoo philous
पक्षी द्वाराOrnithophilous
घोंघा द्वाराMalaecophilous
चमगादड़ द्वाराCheraptophilous

निषेचन
(Fertilization)

  • परागण होने बाद निषेचन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। परागकण में उपस्थित नर युग्मक (Malegamit) अंडाशय में उपस्थित अंडाणु (Ova) से संयोग करता है तो इसे निषेचन कहते हैं।
  • जब परागकण वर्तिकाग्र (Stigma) पर आता है तो वर्तिकाग्र से अंडाशय तक एक पराग नली का निर्माण होता है। परागनली से होते हुए परागकण अंडाशय तक पहुँचते हैं।
  • अंडाशय के भीतर बीजांड (Ovule) होते हैं। बीजांड के भीतर भ्रूणकोष (Embregosac) होते हैं। भ्रूणकोष में अंडाणु (Ova) पाये जाते हैं।
  • परागकण बीजांड को चीड़कर अंडाणु (Ova) तक पहुँचती है तब निषेचन पूर्ण हो जाता है। निषेचित अंडाणु Zygote (युग्मनज) कहलाते हैं।
  • निषेचन के बाद अण्डाशय (Ovary) फल के रूप में विकसित होता है तथा बीजाणु बीज में परिवर्तित होकर फल के अंदर सुरक्षित रहते हैं। बीज पौधा की जनन ईकाई है।
  • निषेचन के पश्चात् फूल के विभिन्न भाग में हुए परिवर्त्तन-
    बाह्य दलपुंज- सूख कर गिर जाता है।
    दल पुंज (Corolla)- सूख कर गिर जाता है।
    अंडाशय (Ovary)- फल बन जाता है।
    अंडाशय की भित्ती- फलभित्ती (Pericap) बन जाता है।
    बीजांड (Ovule)- बीज बन जाता है।
    बीजांड का अध्यावरण (Integument)- बीज-खोल बन जाता है।
    युग्मनज (Zygote)- भ्रूण (Embreyo)
  • अनिषेकक जनन (Parthenogenesis)- बिना निषेचन के अण्डाशय की वृद्धि कर फल का निर्माण होना अनिषेकजनन कहलाता है। अनिषेकित फल में निषेचन के अभाव में भ्रूण (Embreyo) तथा भ्रूणपोष (Embryogsac) का निर्माण नहीं होता है जिससे इस फल में बीज नहीं होते हैं।
  • अधिकांश फल का विकास अंडाशय से होता है अण्डाशय से विकसित फल सत्यफल (True Fruit) कहलाते हैं, जब फल का विकास अण्डाशय के अतिरिक्त फूल के किसी अन्य भाग से होते हैं तो उसे कूट फल (False Fruit) कहते हैं। सेब, काजू कूट फल हैं।
  • प्रमुख फल एवं उनके खाने योग्य भाग
    फल खाने योग्य भाग
    1.लीचीएरील
    2.चना, मूँगफलीभ्रूण एवं बीजपत्र
    3.कटहलपरिदल पुंज एवं बीज
    4.शहतूतरसीले परिदलपुंज
    5.अन्नानासपरिदलपुंज
    6.नारंगीजूसी हेयर
    7.केलामध्य एवं अन्तफल भित्ती
    8.गेहूँभ्रूणपोष एवं भ्रूण
    9.काजूपुष्पवृंत, बीजपत्र
    10.नारियलभ्रूणपोष
    11.पपीता, आममध्य फलभित्ती
    12.अमरूद, अंगूर, टमाटरफलभित्ती, बीजांड
    13.सेब, नाशपातीपुष्पासन
    Note:- आम, बेर, नारियल, सुपारी अष्टिल फल (Drupe Fruit) है, टमाटर, अमरूद, मिर्च, अंगूर, केला बेरीफल (Berry Fruit) है, सेब, नाशपाती पोमफल (Pome Fruit) है।

मानव प्रजनन
(Human Reproduction)

  • मानव सजीव प्रजक (Viviperous) जीव है जो लैंगिक जनन द्वारा अपने जैसे संतानों को उत्पन्न करता है।
  • मानव एकलिंगी (Unisexual or Dioecious) जीव है। अतः इसमें नर तथा मादा अलग-अलग जीवों में पाया जाता है।
  • प्रजनन हेतु मानव में विकसित तथा जटिल प्रजनन तंत्र (Reproductive system) पाया जाता है। नर तथा मादा का प्रजनन तंत्र एक दूसरे से भिन्न होते हैं। प्रजनन तंत्र के अंतर्गत जनन अंग (Sex organe or Gonad) तथा ग्रंथियाँ आते हैं।
  • मानव लगभग 12 वर्षों की आयु में जनन के योग्य हो जाते हैं। मानव जब जनन के योग्य होते हैं तब नर एवं मादा दोनों के शरीर में कई परिवर्तन हो हैं। इस परिवर्तन को प्यूबर्टी (Puberty) कहते है। प्यूबर्टी के समय होने वाला परिवर्त्तन अंतःस्त्रावी ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोन के द्वारा होता है।
  • मानव 13 से 19 वर्ष की आयु तक वयस्क होनी की सारी प्रक्रिया को पूरी कर लेता है तथा शारीरिक तथा मानसिक रूप से जनन के योग्य बन जाता है। इस उम्र परिसर (13 से 19 वर्ष) को किशोरावस्था या टीनएज (Teenage) कहते हैं।

नर जनन तंत्र
(Male Reproductive System)

नर जनन तंत्र पेल्विस क्षेत्र में स्थित रहता है तथा इसके अंतर्गत निम्न अंग तथा ग्रंथि आते हैं-

1. Testis (वृषण) :

यह मुख्य जनन अंग है क्योंकि इसी में शुक्राणु (Sperm) का निर्माण होता है। शुक्राणु को नर युग्मक (Malegamit) कहा जाता है।

  • प्रत्येक नर में एक जोड़ी वृषण पाया जाता है। प्रत्येक वृषण 5 cm लंबा, 2.5 cm चौड़ा तथा 3 cm मोटा होता है। इसका भार लगभग 12 g होता है।
  • वृषण (Testis) का निर्माण तीसरे-चौथे महीने में वृक्क (Kidney) के आगे में होता है, जो धीरे-धीरे नीचे उतरकर जांघों के बीज एक थैली समान संरचना में बंद हो जाता है। इस थैली को वृषण कोष (Scrotal Sac) कहते हैं।
  • वृषण कोष का निर्माण बाहर से त्वचा के द्वारा तथा भीतर से पेरीटोनियम झिल्ली द्वारा होता है। दोनों ही वृषण (Testis) वृषण कोष में पहुँचकर पेरीटोनियम मांसपेशी द्वारा आपस में जुट जाते हैं तथा पुनः कभी शरीर के अंदर नहीं जा पाते हैं।
  • वृषण कोष (Scrotal sac) में शुक्राणु निर्माण (Spermatogenesis) हेतु उपयुक्त तापमान पाया जाता है। वृषण कोष का ताप शरीर के ताप (37°C) से 2°C - 3°C कम रहता है।
  • वृषण (Testis) के भीतर ढेर सारी शुक्रजनन नलिकाएँ (Seminiferous Tubules) पाया जाता है, जिसमें शुक्राणु (Sperm) का निर्माण होता है। एक वयस्क नर में प्रतिदिन 1012 से 1013 शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
  • वृषण (Testis) का निर्माण संयोजी उत्तक के तीन परतों के द्वारा होता है। सबसे बाहरी परत परत को Tunica Vaginalis, बीच के परत को Tunica albuginae तथा सबसे भीतर परत को Tunica Vasculosa कहा जाता है।
  • कभी-कभी किसी कारणवश मनुष्य का वृषण, वृषणकोष (Scrotal sac) में नहीं आ पाता है तथा ऊपरी भाग में ही फँस जाता है। ऐसे वृषण अविकसित रह जाते हैं तथा शुक्राणु (Sperm) नहीं बना पाते है। इस रोग को Cryptorchidism कहा जाता है।

2. Epididymis (अधिवृषण) :

वह मोटी नली समान रचना है जो वृषण के भीतरी भाग से चिपकी रहती है। अधिवृषण का निर्माण सभी शुक्रवाहिकाएँ नलियों (Semiferous tubeles) के आपस में जुटने से निर्मित होता है।

  • अधिवृषण शुक्राणु का प्रमुख संग्रह स्थान है। शुक्राणु अधिवृषण में परिपक्व होकर निषेचन के योग्य बनता है।

3. Vas Deferens (शुक्रवाहिका) :

दोनों अधिवृषण से निकली नली समान रचना शुक्रवाहिका कहलाती है। शुक्रवाहिका 25 cm लंबी होती है, जो उदरगुहा (Abdominal cavity) में प्रवेश कर मूत्राशय तक पहुँचती है।

  • शुक्रवाहिका मूत्राशय के पास पहुँचकर शुक्राशय (Seminal Vasicle) से जुट जाती है।
  • शुक्रवाहिका शुक्राणुओं (Sperm) को आगे बढ़ाने का कार्य करती है तथा अतिरिक्त शुक्राणुओं को जमा रखती है।

4. Seminal Vasicle (शुक्राशय) :

यह खोखली थैली समान एक जनन ग्रंथि है जो ऐसे पदार्थ का स्त्राव करता है जिससे शुक्राणुओं को पोषण प्राप्त हो सके।

  • इस ग्रंथि से स्त्रावित पदार्थ क्षारीय होते हैं। स्त्रावित पदार्थ में मुख्य रूप से प्रोटीन, फ्रक्टोज, साइट्रेट, इनोस्टोल मैग्नीशियम आदि पाये जाते हैं।

5. Ejaculatory duct (स्खलन नली) :

यह एक छोटी नली समान संरचना है जो शुक्रवाहिका (Vas Detrentia) तथा शुक्राशय (Seminal Vascicle) के मिलने से बनता है।

  • स्खलन नली की संख्या दो होती है दोनों ही स्खलन नली प्रोस्टेट ग्रंथि में प्रवेश कर जाती है। प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्राशय से आने वाली मूत्रनली से जुट जाती है।
  • नर मानव (Male) में प्रजनन मार्ग तथा मूत्रमार्ग एक ही होता है, परन्तु मादा मानव (Female) में यह अलग-अलग होता है।

6. Prostate gland (पुरःस्थ ग्रंथि) :

यह ग्रंथि मूत्राशय के आधार पर स्थित रहता है तथा इसकी नली मूत्रमार्ग में खुलती है। यह ग्रंथि बाएँ तथा दाएँ दो लोब में बँटी रहती है, परन्तु दोनों ही लोब आपस में जुड़े रहते हैं।

  • इस ग्रंथि से अनेकों प्रकार के ऑक्सीकारक एंजाइम, साइट्रिक अम्ल और जिंक उत्पन्न होते है जिसकी प्रकृति अम्लीय होती है। इस ग्रंथि से होने वाला स्त्राव शुक्राणु को सक्रिय बनाता है।
  • मानव वीर्य (Semen) में एक विशेष गंध होती है, यह गंध इसी ग्रंथि द्वारा स्त्रावित पदार्थ के कारण होता है।

7. Cowper's Gland or Bulbo-Urethral gland (काउपर ग्रंथि) :

यह ग्रंथि एक जोड़ा होता है जो प्रोस्टेट ग्रंथि के ठीक नीचे स्थित होता है। इस ग्रंथि की नली भी मूत्रमार्ग में ही खुलती है।

  • इस ग्रंथि से स्त्रावित पदार्थ क्षारीय होता है जिसमें एलब्यूमीन प्रोटीन की अधिकता होती है।
  • इस ग्रंथि का स्त्राव मूत्र के अम्ल से शुक्राणुओं का रक्षा करता है तथा संभोग के समय जनन-अंगों को चिकनापन प्रदान करता है।

8. Penis (लिंग) :

यह एक मांसल तथा बेलनाकार संरचना है जो वृषणकोष के ठीक बीचो-बीच स्थित रहता है।

  • पेनिस के दोनों किनारे की ओर मोटी-मोटी रक्त नलिकाएँ पायी जाती है, जिसमें उच्च रक्तदाब जब उत्पन्न होता है तो पेनिस लम्बा, मोटा तथा कठोर हो जाता है। पेनिस को उत्तेजित करने में रक्तदाब के अतिरिक्त Nervi erecti नामक तंत्रिका तंतु तथा एडरीनलीन हॉर्मोन भी सहायक है।
  • लिंग (Penis) के अंतिम भाग को शिश्न (glans) कहते है। शिश्न के ऊपर त्वचा का एक ढीला-ढाला आवरण होता है जिसे प्रिप्यूस (Prepuce) कहते हैं।

9. Semen (वीर्य) :

संभोग करते समय अथवा मानसिक भावनाओं के प्रभाव से लिंग के शीर्ष भाग से जो द्रव निकलता है उसे वीर्य कहते हैं।

  • शुक्राणु (Sperm), प्रोस्टेट ग्रंथि का स्त्राव तथा काउपर ग्रंथि का स्त्राव मिलकर सीमेन का निर्माण करते है। सीमेन में लगभग 10 प्रतिशत शुक्राणु रहता है तथा शेष भाग को सेमिनल प्लाज्मा कहते हैं। सीमेन क्षारीय होता है जिसका pH मान 7.3 से 7.5 होता है।

मादा जनन तंत्र
(Female Reproductive System)

मादा (Female) के प्रजनन तंत्र में निम्नलिखित अंग पाये जाते हैं-

1. अंडाशय (Ovary) :

प्रत्येक मादा शरीर में एक जोड़ा अंडाशय होता है। अंडाशय अंडाकार आकृति का होता है जो 3 cm लंबा, 1.5 cm चौड़ा तथा 1 cm मोटा होता है।

  • अंडाशय, संयोजी उत्तक से बने परत से आच्छादित रहती है, इस परत को ट्यूनिका एलबुजिनिया कहते हैं। ट्यूनिका एलबुजिनिया के नीचे के परत को जनन-एपिथिलियम (Germinal epithelium) कहते हैं।
  • अंडाशय के जनन-एपिथिलियम को कोशिका से अंडाणु (Ova) विकसित होता हैं। अंडाणु को मादा-युग्मक (Female gamit) कहा जाता है।
  • अंडाशय में अंडाणु निर्माण की प्रक्रिया को अंडजनन (Oogenesis) कहते हैं। मासिक-चक्र के दौरान एक अण्डाशय से एक अंडाणु (Ova) का अण्डोत्सर्जन (Ovulation) बारी-बारी से होता है। एक स्त्री (Female) अपने पूरे प्रजनन काल में 400 से 450 अंडाणु (Ova) का निर्माण करता है।

2. अंडवाहिनी या फैलोपियन नलिका (Oviduct or fallopiantube) :

प्रत्येक मादा शरीर में दो अंडवाहिनी पाया जाता है। अंडवाहिनी 12 cm लंबा होता है जो दोनों अंडाशय के ऊपरी भाग से शुरू होकर गर्भाशय के ऊपरी भाग तक होती है।

  • अंडवाहिनी के शीर्ष भाग पर अँगुलियों के समान रचना होती है जिसे फिम्ब्री (Fimbriae) कहते हैं। इस संरचना अंडाशय से निकले अंडाणु (Ova) को पकड़ लेता है जिससे अंडाणु फैलोपियन नलिका में आ जाती है।

3. गर्भाशय (Uterus) :

गर्भाशय की आकृति नाशपाती के समान होता है। यह उदरगुहा के पेल्विक क्षेत्र (Pelvic) में मलाशय (Rectum) तथा मूत्राशय (Urinary Bladder) के बीच स्थित होता है।

  • गर्भाशय में ही मानव भ्रूण का पूर्ण विकास होता है। गर्भाशय सामान्य स्थिति में 7-8 cm लंबी होती है परंतु जब इसमें भ्रूण का विकास होता है तब यह 18-20 cm लंबी हो जाती है, पुनः शिशु के जन्म के बाद छोटी हो जाती है।
  • गर्भाशय तीन स्तरों का बना एक पेशीय संरचना है। बाहरी स्तर को पैरीमैट्रियम, मध्य स्तर को मायोमैट्रीयम तथा सबसे भीतरी स्तर को इंडोमैट्रीयम कहते है।
  • गर्भाशय की ऊपरी भाग चौड़ा होता है जो फैलोपियन नालिका से जुड़ा होता है तथा नीचला भाग सँकरा होता है जिसे सर्विक्स (Cervix) कहते हैं। सर्विक्स, योनि (Vagina) में खुलता है।

4. योनि (Vagina) :

योनि को मैथुन कक्ष (Capulation chamber) भी कहते हैं। यह एक पेशीय नली है जो 7-10 cm लंबी होती है तथा यह फैलने योग्य होती है।

  • योनि बाहर की ओर एक छिद्र के द्वारा खुलता है, इस छिद्र को वल्वा (Valva) कहते है। वल्वा के ऊपर एक पतली झिल्ली होती है जिसे हाइमेन झिल्ली कहते है। हायमेन झिल्ली एक बार टूट जाने पर पुनः नहीं बनता है।
  • पहली बार संभोग करने पर अथवा शारीरिक परिश्रम जैसे- व्यायाम, खेलकूद के दौरान हायमेन झिल्ली नष्ट हो जाती है।
  • सर्विक्स तथा योनि मिलकर जन्म नाल (Birth canal) का निर्माण करता है। जन्म नाल से ही शिशु अपने माँ के गर्भ से बाहर आते हैं।

5. बाह्य जननेंद्रिय (External genitalia) :

इसे बाह्य जनन अंग भी कहते हैं, इसके अंतर्गत लेबिया मेजोरा, लोबिया माइनोरा, वेस्टिब्यूली एवं क्लाइटोरिस आते हैं।

  • लेबिया मेजेरा, एक जोड़ा त्वचा के फोल्ड के रूप में होता है जिसपर बाल पाये जाते हैं। लेबिया मेजोरा के नीचे एक जोड़ा बिना बाल वाले त्वचा के फोल्ड को लोबिया माइनोरा कहते हैं।
  • लोबिया माइनोरा के नीचे बर्थोलियन ग्रंथि पायी जाती है। इस ग्रंथि से स्त्रावित होने वाला तरल पदार्थ योनि (Vagina) की अम्लता को नष्ट करता है और इसे चिकनाहट प्रदान करता है।

6. स्तन ग्रंथि (Mammary gland) :

यह ग्रंथि मादा तथा नर दोनों में पाये जाते हैं, परन्तु नर मानव में यह ग्रंथि अक्रिय रहता है। मादा मानव में इस ग्रंथि के चारों ओर वसा का जमाव होने से फूली हुई दिखाई पड़ती है।

  • प्रत्येक स्तन के भीतर संयोजी उत्तकता बना 15-20 पालि (lobes) होता है तथा प्रत्येक पाली वसा उत्तक द्वारा एक दूसरे से अलग होता है। प्रत्येक पालि में एक लैक्टोफेरस नालिका पायी जाती है जिसमें दूध का निर्माण होता है।
  • सभी पालि (lobes) का लैक्टोफेरस नालिका स्तनग्रंथि के शीर्ष भाग में खुलती है जिसे निपल (Nipple) कहते हैं। निपल नर तथा मादा दोनों ही मानव में पाये जाते हैं। निपल के चारों ओर का क्षेत्र जहाँ के त्वचा का रंग ज्यादा गाढ़ा होता है उसे एरिओला (Areola) कहते हैं।
  • स्तन ग्रंथि द्वारा शिशु के पोषण हेतु दूध का स्त्राव होता है। दूध-स्त्राव स्तन ग्रंथि से केवल प्रसव के बाद ही होता है।

मासिक-चक्र
(Menstrual cycle)

  • मादा मानव में अण्डाणु (Ova) का निर्माण एक विशेष चक्र के अधीन होता है जिसे मासिक चक्र या अण्डाशय चक्र (Ovarian cycle) कहते हैं। यह चक्र सामान्य रूप से 28 दिनों का होता है, इसके बाद पुनः इसकी पुनरावृत्ति होती है।
  • मासिक चक्र का प्रारंभ 12 से 15 वर्ष की आयु में प्रारंभ होता है। मादा शरीर में पहली बार मासिक चक्र का प्रारंभ होना मिनार्क (Menarch) कहलाता है। 50 वर्ष की आयु के बाद मासिक चक्र बंद हो जाता है। मासिक चक्र का बंद होना मिनोपॉज कहलाता है।
  • मासिक चक्र के प्रारंभ होते ही अंडाशय में अंडाणु (Ova) परिपक्व होने लगता है तथा मासिक चक्र के मध्य (14वें दिन) में अंडाणु, अंडाशय से निकल फेलोपियन नलिका में पहुँच जाते हैं। अगर अंडाणु 36 घंटा (16वें से 18वें दिन तक) में शुक्राणु से निषेचित नहीं होता है तो यह नष्ट हो जाता है।
  • अंडाणु जब निषेचित नहीं होता है, तब 28वें दिन रक्त, गर्भाशय के दिवार की टूटी कोशिका तथा नष्ट हुआ अंडाणु योनि (Vagina) के द्वारा बाहर आ जाते हैं इसे मासिक स्त्राव कहते हैं। मासिक स्त्राव 3 से 5 दिन तक चलता है।
  • अगर अंडाणु, शुक्राणु से निषेचित हो गया तब अंडाशय में अंडाणु का निर्माण बंद हो जाता है तथा सम्पूर्ण गर्भावस्था (Pregncy) के दौरान मासिक चक्र बंद रहता है।

निषेचन
(Fertilization)

  • शुक्राणु (Sperm) तथा अण्डाणु (Ova) की संलयन की प्रक्रिया निषेचन कहलाता है। निषेचन मादा शरीर के फैलोपियन नलिका में सम्पन्न होता है।
  • निषेचन के बाद शुक्राणु तथा अंडाणु के संलयन से युग्मक (Zygote) बनते हैं। युग्मक एककोशिकीय तथा द्विगुणीत (Deploid) होते हैं। शिशु के लिंग का निर्धारण निषेचन के समय ही हो जाता है।
  • युग्मक (Zygote) में समसूत्री कोशिका विभाजन शुरू हो जाता है, जिसके बाद भ्रूण (Embreo) का निर्माण होता है। भ्रूण गर्भाशय में पहुँचकर गर्भ (Foetus) बनाता है। गर्भ ही मानव का लघु स्वरूप होता है। गर्भ का निर्माण निषेचन के एक सप्ताह के बाद होता है।
  • गर्भ के बाहरी झिल्ली को जरायु (Chorion) कहते हैं। जरायु में अँगुली के समान संरचनाएँ पायी जाती है जिसे विलाई (Villi) कहते हैं। विलाई, गर्भाशय के दिवार से सटकर अपरा (Placenta) का निर्माण करता है। अपरा (Placenta) का निर्माण भ्रूण रोपण के चार सप्ताह बाद होता है।
  • अपरा (Placenta) द्वारा ऑक्सीजन तथा पोषक पदार्थ भ्रूण में जाते हैं तथा CO2 तथा अन्य उत्सर्जनशील पदार्थ बाहर आ जाते हैं। गर्भ, अपरा से एक मजबूत डोरी जैसी संरचना से जुड़ा रहता है जिसे नाभिरज्जु (Umbilical cord) कहते हैं।

गर्भाशय में गर्भ का विकास
(Foetus Development un Uterus)

भ्रूण जब गर्भाशय में स्थापित होता है इसके बाद भ्रूण में तीन जनन स्तरों (Germinal layer) का निर्माण होता है- यह है, एक्टोडर्म (बाह्य परत), मिजोडर्म (मध्य परत) तथा एंडोडर्म (आंतरिक परत)।

भ्रूण अथवा गर्भ के तीन जनन स्तरों से विभिन्न प्रकार के अंगों का निर्माण होता है, जो निम्न है-

1. एंडोडर्म, मुख्य रूप से आहारनाल या पाचनतंत्र का निर्माण करता है। इसके अलावे इस स्तर से श्वसनतंत्र, मूत्राशय एवं कान के मध्य भाग का निर्माण होता है।

2. मेसोडर्म परत से मांसपेशी, हृदय, रक्त नली, वृक्क तथा जनन अंगों का निर्माण होता है। इस परत की कुछ कोशिकाओं में शरीर के सभी अंगों तथा उत्तकों को उत्पन्न करने की क्षमता होती है, ऐसे कोशिकाओं को स्टेमसेल (Stem cell) कहते हैं।

3. एक्टोडर्म परत से त्वचा, मस्तिष्क, मेरुरज्जु (Spinal cord) तथा तंत्रिका (Nerves) का निर्माण होता है।

मनुष्य में गर्भावस्था की पूर्ण अवधि चालीस सप्ताह अथवा 9 महीने, 10 दिन का होता है। प्रत्येक माह गर्भ के कुछ-न-कुछ परिवर्तन होते रहता है। यह परिवर्तन निम्न तरह से होता है-

1. पहला महीना के बाद शिशु के हृदय का विकास होता है। हृदय शिशु में निर्मित होने वाला प्रथम अंग है।

2. दूसरे महीने के अंत तक हाथ-पैर तथा अँगुलियाँ विकसित हो जाता है।

3. तीसरे माह के अंत तक शिशु से सभी अंग-तंत्र (पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र आदि) का विकास हो जाता है।

4. पाँचवे महीने के दौरान सिर पर बाल आने लगते हैं। इसी माह के दौरान गर्भ में गतिशीलता आ जाती है तथा माँ को अपने शिशु के गतिविधि का अनुभव होने लगता है।

5. छठे महीने के अंत तक पूरे शरीर पर बाल आ जाते हैं तथा शिशु के आँखों की पलके अलग-अलग हो जाती है।

6. नौवें महीने के अंत में शिशु पूर्णरूप से विकसित हो जाते हैं तथा जन्म लेने हेतु तैयार हो जाते हैं।

संतान उत्पत्ति की क्रिया को प्रसव (Parturition) कहते हैं। प्रसव एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीव्र प्रसव वेदना (Labour pain) उत्पन्न होता है। अपरा (Placenta) का गर्भाशय से टूटकर अलग होना ही प्रसव वेदना का कारण है। प्रसव के दौरान शिशु के साथ-साथ अपरा भी गर्भाशय के बाहर निकल आते हैं।

संतान उत्पत्ति के 24 घंटे के अंदर स्तनग्रंथि (Mammary gland) में दूध बनना प्रारंभ हो जाता है। ऑक्सीटोसीन हॉर्मोन स्त्रावित होकर स्तन ग्रंथि के आंतरिक दाब को बढ़ा देता है जिससे दूध बाहर निकलने लगता है। शिशु जैसे ही दूध पीना प्रारंभ करता है, ऑक्सीटोसीन हॉर्मोन के कारण मातृत्व प्रेम अपने चरम स्तर पर पहुँच जाता है।

गर्भावस्था के दौरान प्रायः शिशु की माँ शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से अस्वस्थ महसूस करती है क्योंकि उसे प्राप्त होने वाला पोषण का अधिकांश भाग गर्भ में पल रहे भ्रूण के पोषण में चला जाता है। अतः गर्भावस्था के दौरान विशेष पोषण की आवश्यकता होती है जिसमें शर्करा, प्रोटीन तथा सभी प्रकार के लवण का होना आवश्यक है।

यौन-संचारित रोग
(Sexually Transmitted Disease)

ऐसे रोग जो लैंगिक सम्पर्क के कारण फैलती है, उसे यौन संचारित रोग (STD) कहते हैं। ये रोग विभिन्न प्रकार सूक्ष्मजीव, जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ तथा कवक के कारण होता है। प्रमुख रोग है-

रोग रोग के लक्षण कारक सूक्ष्मजीव
1. AIDS शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। विषाणु (Virus)
2. मस्सा (Warts) मस्सा योनि (Vagina), वल्वा, शिश्न (Penis) या गुदाद्वार (Anus) में हो सकता है। Human Papiloma Virus
3. हर्पिस बाह्य जनन अंगों पर जलन युक्त छाले बन जाते हैं। Herps simplex Virus
4. कैनडिंडा एलबिंकिस पुरुष के शिश्न तथा स्त्रियों के बाह्य जनन अंग में खुजली यीस्ट (कवक)
5. गोनोरिया पुरुष के मूत्रनली तथा स्त्रियों के गर्भाशय की ग्रीवा प्रभावित होती है। निसेरिया गोनोरी जीवाणु
6. सिफलिस बाह्य जनन अंग पर दाने आकार की फुंसियाँ निकल आती है। ट्रेपोनेमा पैलिडम जीवाणु
7. यूरेथ्राइटिस मूत्रमार्ग में सूजन क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस जीवाणु
8. सर्विसाइटिस सर्विक्स में सूजन क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस जीवाणु
9. सैल्पिनजाइटिस फैलोपियन नलिका में सूजन क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस जीवाणु