Biological Classification of Plant (पादप वर्गीकरण)
जीवों की विविधता का अध्ययन करने हेतु, उन्हें समानताओं एवं असमानताओं के आधार पर विभिन्न समूहों में बाँटने की प्रक्रिया को वर्गीकरण कहते हैं। यह अध्याय पादप जगत (Plant Kingdom) के संपूर्ण वर्गीकरण को कवर करता है।
विस्तृत परीक्षा नोट्स (Detailed Exam Notes)
1. पादप जगत वर्गीकरण का परिचय (Introduction to Plant Classification)
- बीते हुए 3.5 अरब वर्ष के दौरान पृथ्वी पर लाखों सजीवों की जातियाँ विकसित हुई है। इतनी बड़ी संख्या में पाये जाने वाले सजीवों की जातियों को एक-एक करके अध्ययन करना संभव नहीं है।
- जीवों की विविधता के अध्ययन को आसान बनाने हेतु, उसे समानताओं एवं असमानताओं के आधार पर विभिन्न समूह में बाँटते हैं। यह प्रक्रिया वर्गीकरण (classification) कहलाता है।
- जीवविज्ञान की वह शाखा जिनमें जीवों का व्यवस्थित तरीके से वर्गीकरण किया जाता है, उसे वर्गिकी (Taxonomy) कहा जाता है।
- जीवविज्ञान में वर्गिकी के स्थापना का श्रेय कैरोलस लिनियस को है। उन्हें हम वर्गिकी के जनक कहते हैं। लिनियस ने अपनी पुस्तक 'सिस्टेमा नेचुरे' में सर्वप्रथम वर्गीकरण की रूप रेखा प्रस्तुत की थी।
- कैरोलस लिनियस ने समस्त जीवों को दो समूहों में बाँटा था। ये समूह थे- पौधा जगत (Plant Kingdom) तथा जन्तु जगत (Animal Kingdom)।
- लिनियस का द्विजगत वर्गीकरण कुछ ही समय तक अपनायी जाती रही परंतु जैसे ही जीवाणु, प्रोटोजोआ, कवक आदि जीवों का पता चला लिनियस का वर्गीकरण अपर्याप्त सिद्ध हुई।
- वर्तमान में सबसे मान्य वर्गीकरण आर. एच. हिवटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण है। आर. एच. हिवटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित है-
1. पोषण की विधि : क्या जीव में स्वपोषण होता है या विषमपोषण।2. कोशिका के प्रकार : क्या जीव में प्रोकैरियोटिक कोशिका है या यूकैरियोटिक कोशिका।3. कोशिका की संख्या : क्या जीव एककोशिकीय है या बहुकोशिकीय है।4. विकासीय संबंध : विकास के क्रम में विभिन्न जीव आपस में किस प्रकार जुडे़ हैं।
2. पाँच जगत (Five Kingdoms) तथा उनकी विशेषताएँ
- 1. Monera Kingdom (मोनेरा जगत) : इस जगत के जीव सूक्ष्मदर्शी होते है तथा प्रोकैरियोटिक कोशिका के बने होते हैं। इन जीवों में अलैंगिक प्रजनन होता है। पोषण के दृष्टि से इस जगत के विभिन्न सूक्ष्मजीवों में स्वपोषण तथा पर-पोषण होता है। इस जगत में बैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया तथा एक्टीनोमाइसिटिज को रखा गया है।
- 2. Protista Kingdom (प्रोटिस्टा जगत) : इस जगत में एककोशिकीय तथा यूकैरियोटिक कोशिका वाले सूक्ष्मजीवों को रखा गया है। मोनेरा जगत के समान इस जगत के विभिन्न सूक्ष्मजीवों में स्वपोषण तथा पर-पोषण विधि द्वारा पोषण होता है। इस जगत के जीवों में लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों ही प्रकार के प्रजनन पाये जाते हैं। प्रोटोजोआ, यूग्लीना, एककोशिकीय शैवाल तथा स्लाइम मोल्ड इस जगत के प्रमुख जीव हैं।
- 3. Fungi Kingdom (फंगी जगत) : इस जगत में कवक या फफूंद को रखा गया है। ये एककोशिकीय भी होते हैं तथा बहुकोशिकीय भी। कवक में क्लोरोफील नहीं होने के कारण इसमें स्वपोषण नहीं होता है। इस जगत में जीवों में प्रजनन कायिक, अलैंगिक तथा लैंगिक तीनों तरह से होता है। सभी कवक यूकैरियोटिक कोशिका के बने होते हैं।
- 4. Plantae Kingdom (प्लांट जगत) : इस जगत में सभी बहुकोशिकीय पौधों को रखा गया है। सभी पौधे यूकैरियोटिक कोशिका के बने होते हैं तथा इनमें प्रकाशसंश्लेषण द्वारा स्वपोषण की विधि सम्पन्न होती है।
- 5. Animalia Kingdom (एनिमेलिया जगत) : इस जगत के अंतर्गत प्रोटोजोआ वर्ग को छोड़कर पृथ्वी पर के समस्त जंतु आते हैं। सभी जंतु यूकैरियोटिक कोशिका के बने होते हैं जिनमें पर-पोषण होता है।
- कुल पाँच जगत में लगभग 1.8 मिलीयन से अधिक पौधा और जंतु की जातियाँ (Species) समाहित है। वर्गीकरण की आधारभूत एवं मूल इकाई जाति है।
3. टैक्सोनॉमिक अनुक्रम (Taxonomic Hierarchy)
- जीवों का वर्गीकरण में जगत (Kingdom) सबसे बड़ी कोटि (Category) है। वर्गीकरण में जीवों को समानता तथा असमानता के आधार पर विभिन्न कोटि में विभक्त करते है।
- सभी कोटि क्रमबद्ध तरीके से एक-दूसरे से संबंधित होते हैं, जिसे टैक्सोनॉमिक अनुक्रम (Taxonomic hierarchy) कहते है। जो निम्न है-
Species → Genus → Family → Order → Division या Phylum → Kingdom
(जाति → वंश → कुल → गण → प्रभाग/संघ → जगत)
4. द्विपद-नाम पद्धति (Binomial Nomenclature)
- एक ही जन्तु या पौधा का नाम, विभिन्न भाषा में, विभिन्न देश में अलग-अलग है, जिसके कारण जन्तु या पौधा को विश्व के सभी भागों में पहचानना मुश्किल होता है।
- नामों में विविधता की स्थिति से बचने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रत्येक जीव का एक मानक नाम दिया है, जिसे वैज्ञानिक नाम कहा जाता है। एक जीव का वैज्ञानिक नाम पूरे विश्व में एक समान रहता है।
- जीवों के वैज्ञानिक नाम लिखने हेतु जिस पद्धति का उपयोग होता है, उसे द्विनाम पद्धति कहते है।
- द्विनाम पद्धति में किसी जीव का वैज्ञानिक नाम दो शब्दों से मिलकर बना होता है, जिसमें पहला शब्द वंशीय नाम (Generic name) तथा दूसरा शब्द जातीय नाम (Specific name) कहलाता है। वैज्ञानिक नाम में, वंश का नाम बड़े अक्षर से तथा जाति का नाम छोटे अक्षर से शुरू होता है।
- सर्वप्रथम स्वीडेन के वनस्पति विज्ञानी कैरोलस लिनियस ने द्वि-नाम पद्धति को उपयोग में लाना प्रारंभ किया। उन्होंने लैटिन तथा ग्रीक शब्दों का उपयोग कर वैज्ञानिक नाम लिखने की परंपरा की शुरुआत की थी। कैरोलस लिनियस को आधुनिक वनस्पति शास्त्र के पिता भी कहते है।
5. प्रमुख वैज्ञानिक नाम (Scientific Names)
- प्रमुख पौधा का वानस्पतिक नाम:
सरसो – Brassica campestrisधान – Oryza sativaगेहूँ – Triticum aestivumगुलाब – Rosa chinesisमनुष्य – Homo sapieusआम – Mangifera indicaलीची – Litchi chinensisसूर्यमुखी – Helianthus annuusआलू – Solanum tuberosumअमरूद – सोडियम गुआजावा (Psidium guajava)
- प्रमुख कीटभक्षी पौधा उसके वानस्पतिक नाम:
घटपर्णी (Pitcher) – नेपन्थिस खासियानासनड्यू (Sundew) – ड्रोसेराब्लैडरवर्ट (Bladderwort) – यूट्रीकुलेरियावीनसफ्लाईट्रेप (Venus Fly Trap) – डायोनिया मसीपुलासारासीनिया (Sarracenia) – नेपन्थिस खासियानाबटरवर्ट्स (Butter worts) – पिंगुइकुलाकोबरा लिली (Cobra lily) – डार्लिंग टोनिया
- प्रमुख मोटा अनाज एवं उनके वैज्ञानिक नाम:
मक्का – जीमेजकडुआ (रागी) – ऐल्युसाइन कोराकानाज्वार – सोरघम वल्गेयरबाजरा – पेनिसेंटम ग्लॉकम
- प्रमुख औषधिय पौधा उनके वैज्ञानिक नाम:
भटकटैया (कंटेली) – सोलेनम जेन्थोकार्पमअश्वगंधा – क्लीओम विस्कोसाबज्रदंती – बालैरिया प्रायोनाइटिस
6. पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of Plant Kingdom)
- सर्वप्रथम आइकलर ने पादप जगत को दो उपजगत में बाँटा था-
- 1. क्रिप्टोगैम्स (Cryptogams)- इसके अंतर्गत वे पौधा आते हैं जिनमें फूल तथा बीज नहीं होते हैं। इस उपजगत को तीन फाइलम में विभाजित किया गया है ये है- थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा तथा टेरिडोफाइटा।
- 2. फैनेरोगैम्स (Phanerogams)- इसके अंतर्गत वे पौधा आते हैं जिसमें फूल तथा बीज पाये जाते हैं। इस उपजगत को दो भागों में बांटा गया है ये है- जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म।
7. Thallophyta (थैलोफाइटा) और शैवाल
- थैलोफाइटा (Thallophyta) : थैलोफाइटा के अंतर्गत वैसे पौधों आते हैं जिनमें जड़, तना, पत्ती का अभाव रहता है तथा इनमें संवहन उत्तक (जाईलम, फ्लोएम) नहीं पाये जाते हैं।
- थैलोफाइटा समूह के प्रमुख पौधा हैं- शैवाल तथा लाइकेन।
- सभी पौधा क्लोफील युक्त स्वपोषी और प्रायः जलीय (मीठाजल, समुद्री जल) और नम स्थानों में उगते हैं। प्रजनन इसमें प्रायः अलैंगिक विधि द्वारा बीजाणुओं (Sporangia) के माध्यम से होता है।
- शैवाल एककोशिकीय होते हैं और बहुकोशिकीय भी। एककोशिकीय शैवाल मोनेरा जगत में है या प्रोटिस्टा जगत में। बहुकोशिकीय शैवाल के तीन वर्ग हैं- क्लोरोफाइसी (हराशैवाल), फियोफाइसी (भूरा शैवाल) तथा रोडोफाइसी (लाल शैवाल)।
- नील हरित शैवाल- सायनो बैक्टीरिया का नया नाम नील हरित शैवाल है। इस शैवाल का इस्तेमाल जैव-उर्वरक बनाने में होता है। यह मोनेरा जगत के प्रोकैरियोटिक जीव हैं।
- शैवाल तालाबों, जलाशय में इतने तेजी से वृद्धि करने लगता है कि अन्य जीवों के अस्तित्व के समक्ष खतरा उत्पन्न हो जाता है। बरसात के समय जमीन पर फिसलन वाला हरा परत शैवाल ही बनाता है।
- प्रसिद्ध लाल सागर का रंग लाल, लाल शैवाल के कारण है। लाल शैवाल इस सागर के ऊपरी भागों को अच्छादित करके रखा है।
- शैवाल के आर्थिक महत्व :
(i) क्लोरेला शैवाल का प्रयोग अंतरिक्ष यात्री भोजन एवं ऑक्सीजन प्राप्त करने हेतु करता है। क्लोरेला में 50% तक प्रोटीन होता है। क्लोरेला शैवाल से क्लोरेलिन नामक एंटीबायोटिक भी तैयार होता है।(ii) ग्रेसिलेरिया, जलीडियम, कांड्रस जैसे लाल शैवाल से अगर-अगर प्राप्त होता है। अगर-अगर का प्रयोग बेकरी व्यवसाय, मिठाई, दंतमंजन, दवा निर्माण तथा कृत्रिम वृद्धि माध्यम बनाने में किया जाता है।(iii) लैमिनेरिया शैवाल से आयोडिन निकाला जाता है। शैवाल में आयोडिन आयोडाईड रूप में रहता है। लेमिनेरिया शैवाल से सोडियम लैमिनेरिन सल्फेट प्राप्त होता है जो खून को जमने से रोकता है।(iv) जापान, मलेशिया, चीन, इंडोनेशिया में पोरफाइरा शैवाल अत्यधिक प्रिय भोजन है।(v) भूरे शैवाल को समुद्री घास कहा जाता है। समुद्री घास का उपयोग पशु चारे में, मुर्गियों के चारे में किया जाता है।(vi) एल्जिनिक एसीड समुद्री शैवाल से निकाला जाता है, इसका उपयोग रबड़ उद्योग में लैटैक्स के उपचार में होता है।
8. लाइकेन (Lichen)
- लाइकेन दो जीवों के बीच के सहजीवी (Symbiosis) संबंध के कारण अस्तित्त्व में आया है। ये दो जीव है कवक तथा शैवाल। कवक तथा शैवाल के बीच के सहजीवी संबंध को, हेलोटिज्म (Helotism) कहते हैं।
- लाइकेन चट्टानों पर, पेड़ के तने पर, तथा जमीन पर धब्बों के रूप में रहते हैं तथा अत्यंत कड़े होते हैं।
- लाइकेन के कवक अवयव (Mycobiont) जल तथा खनिज पदार्थ अवशोषित कर शैवाल को देता है तथा बदले में शैवाल प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार कर कवक को देते हैं।
- आर्थिक महत्व के लाइकेन :
(i) लाइकेन विपरित परिस्थितियों वाले वातावरण में उगकर पारिस्थितिकी तंत्र को प्रारंभ करता है। लाइकेन वायु प्रदूषण के सूचक के तौर पर काम करता है।(ii) परमेलिया लाइकेन से मिर्गी रोग के उपचार हेतु औषधि तैयार किये जाते हैं।(iii) रोसेला लाइकेन से लिटमस पत्र तैयार किये जाते हैं।(iv) इण्डोकार्पन लाइकेन का प्रयोग जापान के लोग सब्जी के रूप में करते हैं।
9. ब्रायोफाइटा (Bryophyta)
- ब्रायोफाइटा के अंतर्गत आने वाले पौधा को पादप जगत का उभयचर कहा जाता है। क्योंकि इस समुदाय के पौधे जमीन पर पाये जाते हैं परंतु निषेचन हेतु पानी की आवश्यकता होती है।
- पौधा का आकार थैलस के समान होता है, परंतु वास्तविक तना तथा पत्ती जैसी संरचना होती है, परंतु वास्तविक जड़ का अभाव रहता है। पौधे में जड़ जैसी संरचना होती है जिसे मूलाभास (Rhizoids) कहते हैं।
- पौधे में संवहन उत्तक (जाईलम, फ्लोएम) का अभाव होता है। पौधा का लैंगिक अंग बहुकोशिकीय होते हैं। नर जनन अंग को पुंधानी (Anthridium) तथा स्त्रीजनन अंग को स्त्रीधानी (Archegonium) कहते हैं।
- प्रमुख पौधा- मॉस (फ्यूनेरिया) मार्केशिया, रिक्सिया, बारब्यूला, ऐन्थोसीरस आदि। मॉस तथा लिवरवर्ट ब्रायोफाइटा समुदाय के चर्चित पौधा समूह है।
- ब्रायोफाइटा के आर्थिक महत्व :
(i) मॉस स्तनधारी, चिड़ियाँ तथा अन्य जानवरों के भोजन के रूप में काम आते हैं।(ii) स्फैग्नम मॉस जिसे पीट मॉस भी कहा जाता है, में जल अवशोषण तथा अवशोषित जल को संग्रह करने की अधिक क्षमता होती है, इसलिये इन्हें नर्सरी में पैकिंग मैटेरियल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।(iii) सूखे मॉस का इस्तेमाल ईधन के रूप में होता है।(iv) मॉस जमीन में चटाई की तरह बीछे होते हैं तथा बर्षा ऋतु में मिट्टी का क्षरण नहीं होने देते हैं।
10. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)
- टेरीडोफाइटा समुदाय पृथ्वी पर का पहला विकसित पौधा है। इस समुदाय के पौधों में जड़, तना, पत्ती विकसित होते हैं तथा संवहन (जाइलम, फ्लोएम) तंत्र पाये जाते हैं।
- इस समुदाय के पौधा प्रायः छायादार एवं नम स्थानों पर उगते हैं। पौधा में फूल तथा बीज उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती है।
- इस समुदाय के पौधा के जनन अंग, बहुकोशिकीय होते हैं। नर जनन अंग पुंधानियाँ (antheridia) तथा मादा जनन अंग स्त्रीधानियाँ (Archegonia) होते हैं। निषेचन हेतु जल की आवश्यकता होती है।
- हेटोरोस्पोरस टेरिडोफाइटा में जाइगोट मातृ पौधा पर ही लगा होता है। जाइगोट विभाजित होकर भ्रूण बनाता है। इस घटना को पौधा में बीज स्वभाव की उत्पत्ति माना जाता है।
- प्रमुख पौधा- मर्सीलिया, फर्न, हॉर्सटेल सिनैजिनेला, इक्वीजीटम आदि।
- टैरीडोफाइटा के आर्थिक महत्व :
(i) लाइकोपोडियम बीजाणु (Spore) का उपयोग दवाई बनाने में होता है।(ii) मर्सीलिया का प्रयोग सब्जी के रूप में होता है। टेरीडीयम का उपयोग पशु चारे के रूप में होता है।(iii) एजोला जिसे जलीय फर्न कहते हैं इसका इस्तेमाल जैव-उर्वरक के रूप में होता है।(iv) सिनैजिनेला में पुर्नजीवन का गुण होता है इसका प्रयोग सजावटी पौधों के रूप में होता है।(v) आफियोग्लोसम (Ophioglosum) टेरिडोफाइटा समुदाय के ऐसे पौधा हैं जिनमें सर्वाधिक गुणसूत्र पाये जाते हैं। इनमें गुणसूत्र की संख्या 630 जोड़ा (1260) होता है।
11. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm)
- जिम्नोस्पर्म को को अनावृत्तबीजी या नग्नबीजी कहते हैं। क्योंकि इनके बीजों पर कोई आवरण नहीं होता है। जिम्नोस्पर्म पौधों काष्ठीय (Woody) बहुबर्षी, वृक्ष, झाड़ी के रूप में लगभग हर जगह पाये जाते हैं।
- जिम्नोस्पर्म के पौधों में पूर्ण विकसित मूसला जड़ (Tap root) होते हैं। इनके कुछ पौधों के जड़ों में शैवाल तथा कवक सहजीवी संबंध बना कर रहते हैं। उदा०-
(i) साइकस पौधों के जड़ों में शैवाल सहजीवी के रूप में रहते हैं। ऐसे जड़ को कोरोलॉयड जड़ कहते हैं।(ii) पाइनस पौधों के जड़ों में कवक सहजीवी के रूप में रहते हैं। ऐसे जड़ को माइकोराइजल जड़ भी कहते हैं।
- जिम्नोस्पर्म में परागण (Pollination) वायु के माध्यम से होता है।
- जिम्नोस्पर्म के प्रमुख आर्थिक महत्व :
(i) साइकस, थूजा जैसे पौधा बगीचे में सुंदरता हेतु लगाया जाता है। साइकस के कुछ पौधों के तने में संचित स्टार्च को निकालकर साबूदाना तैयार किया जाता है।(ii) चीड़ से ताड़पीन का तेल, रेजिन तथा बहुमूल्य लकड़ी की प्राप्ति होती है।(iii) इफेड्रा वृक्ष के तने से इफेड्रीन औषधि तैयार होती है। इस औषधि को खाँसी तथा दमा जैसे रोग के उपचार में प्रयोग लाया जाता है।(iv) पाइनस वृक्ष के बीज से चिलगोजा (Chilgoza) प्राप्त होता है। चिलगोजा को जिम्नोस्पर्म का मेवा कहा जाता है।(v) चीड़, सिकोया, देवदाड़, स्प्रूस पौधों के लकड़ी से फर्नीचर बनाये जाते हैं।
12. एंजियोस्पर्म (Angiosperm)
- एंजियोस्पर्म पौधों का सबसे बड़ा समूह है इसके अंतर्गत कुल पौधा का 2.5 लाख स्पीशीज शामिल है। इन पौधा का बीज आवरण से ढँके होते हैं।
- जिम्नोस्पर्म तथा टेरिडोफाइट्स समुदाय के पौधा अनेक स्थानों पर पाये जाते हैं, किंतु ये पौधे इतनी अधिक भिन्न जलवायु में नहीं पाये जाते हैं जितने की एंजियोस्पर्म। एंजियोस्पर्म पौधा टुण्ड्रा जलवायु से लेकर गर्म उष्णकटिबंधीय क्षेत्र रेगिस्तान, अंटार्कटिका तक पाये जाते हैं।
- सबसे छोटा एंजियोस्पर्म पौधा वुल्फीया है। वुल्फीया इतना छोटा होता है इसे सूक्ष्मदर्शी से देखना पड़ता हैं वुल्फीया जलीय पौधा है। सबसे लंबा एंजियोस्पर्म पौधा यूकेलिप्टस है।
- मनुष्य के अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति एंजियोस्पर्म (आवृत्तबीजी) पौधा ही करता है। समस्त अनाज, दालें, खाने में काम आनेवाला तेल, समस्त फल एवं सब्जी, सभी रेशेवाला फसल, इमारती लकड़ी सभी एंजियोस्पर्म पौधा से प्राप्त होता है।
- एंजियोस्पर्म को दो वर्गों में विभाजित किया गया है-
- (i) द्विबीजपत्री (Dicotyledous) - उदा०: चना, मटर, सूर्यमुखी, गेंदा, कद्दू, आलू, नीम।
- (ii) एकबीज पत्री (Monocotylendous) - उदा०: बाँस, केला, खजूर, गेहूँ, घास।
- एकबीजपत्री पौधा तथा द्विबीजपत्री पौधा में प्रमुख अंतर :
1. एकबीजपत्री पौधा के बीज में केवल एक बीजपत्र (Seed leaves) होते हैं, द्विबीजपत्री के बीज में दो बीजपत्र होते हैं।2. एक बीजपत्री के रेशेदार जड़ (Fibrous root) होते हैं जबकि द्विबीजपत्री में मूसला जड़ (Tap root) होते हैं।3. एकबीजपत्री के तना प्रायः खोखला (उदा०- बाँस) डिस्क के तरह (प्याज, लहसून), छद्म (Falase) होता है, द्विबीजपत्री के तने काफी मजबूत तथा सुदृढ़ होते हैं।4. एक बीजपत्री पौधों के पत्ती समान्तर शिराविन्यास वाले होते हैं जबकि द्विबीजी के पत्ती जालिकावत शिराविन्यास वाले होते हैं।5. एक बीजपत्री पौधों के फूल में तीन चक्र होते हैं जबकि द्विबीजपत्री पौधों के फूल में सभी चारों चक्र होते हैं।
13. एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री के प्रमुख वर्ग
- एक बीजपत्री के अंतर्गत शामिल प्रमुख वर्ग-
1. लिलिएसी : उदा०- प्याज, लहसून, सतावर, धृतकुमारी (Aloevera)2. ग्रैमनी या पोएसी : उदा०- गेहूँ, मक्का, धान, जौ, बाँस, दूबघास, गन्ना।3. प्लामी : उदा०- नारियल, सुपारी4. म्यूजेसी : उदा०- केला
- द्विबीजपत्री में शामिल प्रमुख वर्ग-
1. क्रूसोफेरी या ब्रैसिकेसी : उदा०- राई, मूली, फूलगोभी, बंदगोभी, सरसो।2. मालवेसी : उदा०- भिंडी, कपास, पटसन, पटुआ3. लेग्यूगिनीसी : उदा०- सभी दलहन फसलें, छूईमूई, कत्था, इमली।4. सोलेनेसी : उदा०- आलू, मिर्च, टमाटर, तंबाकू, बैगन, ऐट्रोपा बेलाडेना।5. कम्पोजिटी या एस्टेरेसी : यह द्विबीजपत्री का सबसे बड़ा कुल है। उदा०- सूर्यमुखी, गेंदा, गुलदाउदी, डहेलिया, कुसुम, धतूरा6. रूटेसी : उदा०- नींबू, संतरा, मौसमी, बेल7. कुकुरबिटेसी : उदा०- तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी, परवल, करैला, लौकी8. मिरटेसी : उदा०- अमरूद, यूकेलिप्टस, जामुन, मेंहदी9. अम्बलीफेरी : उदा०- धनिया, जीरा, सौंफ, गाजर10. रेनन कुलेसी : उदा०- बटरकप, काला जीरा11. रोजेसी : उदा०- सेब, नाशपाती, गुलाब
14. याद रखने योग्य तथ्य (Points to Remember)
- कपास (Gossypium) के बीजों के सतह पर रेशे होते हैं जिनसे रूईया प्राप्त होता है। पटसन के तंतु से प्राप्त रेशों से रस्सी, बोरे बनाये जाते हैं।
- मेथी के बीज मसाले के रूप में उपयोग होते हैं। कसूरी मेथी की पत्तियाँ मसाले के रूप में उपयोग होता है।
- नील Indigofera tinctoria पौधों से प्राप्त किया जाता है।
- बेलाडोना के पत्ती से ऐट्रोपीन निकाला जाता है। यह दर्दनाशक औषधि में काम आता है।
- अश्वगंधा का प्रयोग खाँसी के उपचार में किया जाता है।
- क्रिकेट खेलने वाला बल्ला सैलिक्स परप्यूरिया पौधों से तैयार होता है।
- पोस्ता के पौधा (Papaver Somniferum) के कच्चे फसल से लेटेक्स निकालकर अफीम तैयार किया जाता है। अफीम से ही मार्फिन, हेरोइन जैसे मादक द्रव्य तैयार किये जाते हैं।
- हशीश, चरस, गांजा, भाँग कैनाबिस पौधा से प्राप्त किया जाता है। हशीश एवं चरस कैनाबिस पौधा के फूल से प्राप्त किया जाता है। गांजा कैनाबिस पौधा के फूलदार एवं फलदार शाखाओं को सूखाकर तैयार किया जाता है। भाँग कैनाबिस के पत्ती को सूखाकर तैयार किया जाता है।
Biological Classification of Plant
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