Micro-organism (सूक्ष्मजीव)

वे जीव जिन्हें हम खुली आँख से नहीं देख सकते हैं, जिसे देखने हेतु सूक्ष्मदर्शी (Microscope) की आवश्यकता होती है, सूक्ष्मजीव कहलाते हैं। सूक्ष्मजीव का अध्ययन विज्ञान के Microbiology शाखा के अंतर्गत किया जाता है।

प्रमुख सूक्ष्मजीव (Major Micro-organisms)

1. Viroids (वायरोयड्स)

  • सर्वप्रथम Viroids की खोज अमेरिकी जीव वैज्ञानिक थिओडोर डायनर ने किया था। वायरोयड्स केवल न्यूक्लिक अम्ल के बने होते हैं।
  • वायरोयड्स विषाणु से भी छोटे होते हैं। यह विषाणु के एक हजारवें भाग के बराबर होते हैं। वायरोयड्स में केवल न्यूक्लिक अम्ल के रूप में RNA ही रहता है।
  • वायरोयड्स केवल परपोषी (host) के शरीर में ही वृद्धि कर सकता है तथा यह पौधों के कई प्रकार के रोग को फैलाते हैं। वायरोयड्स केवल पौधे में पाये जाते हैं

2. Prion (प्रियॉन)

  • यह एक असामान्य प्रकार के सूक्ष्मजीव जो केवल प्रोटीन का अणु बना होता है। प्रियोंन का व्यास मात्र 4-5 nm होता है। इसका निर्माण केवल मस्तिष्क कोशिका में ही होता है।
  • प्रियॉन के कारण बकरी और भेड़ में स्क्रैपी (Scrapie) नामक रोग होता है जिससे उसका तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है।
  • प्रियॉन के कारण मनुष्य में क्रोयुट सल्फेट (याकोब) रोग होता है। इस रोग में मनुष्य की यादाश्त में कमी या पागलपन हो सकता है।

3. Virus (विषाणु)

  • लैटिन भाषा में वायरस शब्द का अर्थ होता है विष। वायरस की खोज सर्वप्रथम रूसी वैज्ञानिक इवानोव्स्की ने किया था। आइवेनोस्की ने वायरस की खोज एक रोगग्रस्त तंबाकू के पौधे में किया था तथा उस वायरस का नाम उन्होंने Tobacco Mosaic Virus (TMV) रखा।
  • विषाणु प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड के बने होते हैं। न्यूक्लीक एसिड या तो RNA या DNA के रूप में होता है। पौधा तथा कुछ जंतुओं के वायरस का न्यूक्लीक एसिड RNA होता है, जबकि अन्य जंतु वायरस में यह DNA के रूप में रहता है।
  • अधिकांश विषाणु का आकार गोलाकार होता है तथा कुछ विषाणु दंडाकार (छड़ के समान) भी होता है।
  • विषाणु की प्रकृति के विषय में सभी जीव वैज्ञानिकों का एक मत नहीं है। कुछ जीव वैज्ञानिक इसे सजीव मानते हैं तथा कुछ निर्जीव।

विषाणु को निर्जीव (Non-living) माना जाता है:

  • (i) वायरस केवल जीवित परपोषी में ही वृद्धि कर सकता है।
  • (ii) वायरस को क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।
  • (iii) वायरस में श्वसन नहीं होता है।
  • (iv) जीवित कोशिका के बाहर वायरस में उपापचय (Metabolism) की क्रियाएँ नहीं होती है।

विषाणु को सजीव (Living) माना जाता है:

  • (i) भिन्न-भिन्न वायरस का आकार और संरचना भिन्न होता है।
  • (ii) वायरस जनन करता है।
  • (iii) वायरस संवेदनशील होता है तथा वातावरण के प्रति उनमें अनुकूलन पायी जाती है।
पादप वायरस (Plant Virus): पादप वायरस पौधों के कोशिका में रहते हैं और उनमें कई प्रकार के रोग को फैलाते हैं।

वायरस द्वारा पौधों में होनेवाले प्रमुख रोग–

  • (i) तंबाकू, गन्ना, ककड़ी, टमाटर, गोभी, मिर्च में होने वाला मोजैक रोग
  • (ii) आलू का लीफ रोल
  • (iii) भिंडी का पीत शिरा मोजैक
  • (iv) टमाटर का लीफ कर्ल

जन्तु वायरस (Animal Virus) और मानव रोग

जन्तु वायरस, पादप वायरस से अलग होते है, क्योंकि इनमें DNA न्यूक्लीक एसिड पाये जाते हैं। वायरस मनुष्य में भी घातक रोग फैलाते हैं। प्रमुख रोग निम्न हैं:

(I) इन्फ्लूएंजा या फ्लू (Influenza)

  • यह रोग मिक्सो वायरस के कारण होता है जो विश्व के लगभग सभी देशों में पाया जाता है। रोग के विषाणु वायु द्वारा रोगी के छींक के साथ फैलता है।
  • विषाणु संक्रमित व्यक्ति के फेफड़ों में तेजी से वृद्धि करता है एवं 1 से 4 दिन बाद बुखार, पूरे शरीर में कंपन, कमजोरी, नाक से पानी निकलना जैसे लक्षण प्रकट होते हैं।
  • कोई प्रभावी दवा उपलब्ध नहीं है, फिर भी एस्पिरिन प्रचुर मात्रा में आराम देती है।

(II) पोलियो (Polio)

  • पोलियो या Polimyelitis रोग पोलियो वायरस के कारण होता है। यह दूषित भोजन/जल के माध्यम से पहले आहारनाल में प्रवेश करता है।
  • आहारनाल से होते हुये यह वायरस रक्त में पहुँचता है, अंत में यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रवेश कर जाता है जिसे नष्ट कर देता है।
  • पेशियों पर तंत्रिका तंत्र का नियंत्रण हट जाता है और वे कार्य करना बंद कर देते हैं।
  • यह रोग बच्चों (6 महीने से 3 वर्ष) में सबसे ज्यादा प्रभावी है। बचाव हेतु पूर्ण रूप से सुरक्षित टीका उपलब्ध है।

(III) खसरा (Measles)

  • यह मोर्बेली विषाणु के कारण होने वाला रोग है। वायु के माध्यम से तेजी से फैलता है।
  • संक्रमित व्यक्ति को नाक, आँख से पानी बहता है, बुखार होता है तथा 3-4 दिनों बाद शरीर पर लाल दाने हो जाते हैं।
  • रोगी को हुवा उबला भोजन करना चाहिए।

(IV) चेचक (Small Pox)

  • यह वैरिओला विषाणु के कारण होता है। यह बहुत ही संक्रामक रोग है (वायु के माध्यम से)।
  • प्रारंभ में बुखार, सिर में दर्द, उल्टी होती है और 4 दिन के बाद मुँह पर लाल दाने निकल आते हैं जो पूरे शरीर में फैल जाता है। टीका उपलब्ध है।

(V) छोटी माता (Chicken Pox / Small Pox)

  • यह रोग वैरिसेला जोस्टर विषाणु के कारण होता है। संक्रामक रोग है, परंतु चेचक से कम।
  • शरीर पर छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं। हल्का बुखार तथा जोड़ों पर दर्द। स्वतः ठीक हो जाता है।

(VI) रेबीज (Rabies)

  • यह रोग रैब्डी वायरस के कारण होता है। फ्रांस के वैज्ञानिक पाश्चर ने देखा तथा टीके का विकास किया।
  • यह कुत्ता, चमगादड़, गीदड़ जैसे जीव में पाया जाता है। काटने पर वायरस मस्तिष्क में चला जाता है।
  • प्रारंभिक लक्षण– सिरदर्द, हल्का बुखार। रोगी पागल के तरह व्यवहार करता है।
  • गले की पेशी में संकुचन बंद हो जाता है, पानी पीने में असमर्थ/पानी से डरता है (हाइड्रोफोबिया)
  • काटने के तुरंत बाद एंटीरेबीज सुई (Antirabies Injection) दिया जाता है।

(VII) हेपेटाइटिस (Hepatitis)

  • यकृत (Liver) में वायरस के संक्रमण से यह रोग होता है। अत्यधिक मात्रा में शराब के सेवन करने से भी बीमारी होती है।
  • टाइप-A (कॉमन): दूषित भोजन/पानी द्वारा। टाइप-B: रुधिर, लार द्वारा संक्रमण।
  • यकृत सामान्य से अधिक बड़ा हो जाता है। त्वचा एवं आँखों के सफेद भाग का पीला पर जाना सबसे प्रधान लक्षण है (जॉण्डिस)। टीका उपलब्ध है।

4. Bacteriophage (बैक्टीरियोफेज)

  • वैसे विषाणु जो जीवाणु पर आक्रमण करते हैं बैक्टीरियोफेज कहलाते हैं। बैक्टीरियोफेज एक प्रकार का वायरस है।
  • खोज ट्वार्ट तथा डी हेरेल ने 1917 में किया था। यह विषाणु प्रोटीन एवं DNA के बने होते हैं। आकृति मनुष्य के शुक्राणु कोशिका की तरह होता है।
  • ये केवल जीवाणु पर ही आश्रित रहता है तथा उन सभी स्थानों पर पाये जाते हैं जहाँ जीवाणु की उपस्थिति होती है।
  • गंगा जल में बैक्टीरियोफेज विषाणु पाये जाते हैं ये पानी को सड़ाने वाले जीवाणु का भक्षण करते रहता है, यही कारण गंगा-जल काफी अधिक दिन होने पर भी खराब नहीं होता है

5. Bacteria (जीवाणु)

  • जीवाणु सर्वव्यापी सूक्ष्मजीव है यह वायु, जल, भूमि—हर जगह मौजूद है। जीवाणु की खोज सर्वप्रथम ल्यूवेनहॉक ने किया था, उन्होंने इसका नाम animalcule रखा था।
  • एहरनबर्ग द्वारा 'जीवाणु (Bacteria)' नाम दिया गया। सर्वप्रथम लुई पाश्चर उसके बाद कोच ने पता लगाया की जीवाणु द्वारा मनुष्य में रोग फैलते हैं।

जीवाणु में पाये जाने वाले सामान्य लक्षण:

  • (i) जीवाणु प्रोकैरियोटिक (Prokaryotic) कोशिका है। जीवाणु की कोशिका भित्ति सेलुलोज से न बनकर पेप्टीडोग्लाइकन की बनी होती है।
  • (ii) अधिकांशत: परपोषी होते है। कुछ स्वपोषी भी होते हैं (सायनोबैक्टीरिया) जिनमें क्लोरोफील पाया जाता है।
  • (iii) विभिन्न जीवाणु का औसत आकार 1 μm से लेकर 5 μm तक होता है।
  • (iv) रूप: गोल आकार (कोकाई/Cocci), घन आकार (सारसीना/Sarcina), छड़ आकार (बैसीलस/Bacillus), सर्पिल (स्पाइरिला/Spirilla), कॉमा आकार (वाइब्रियो/Vibrio)
  • (v) जनन प्राय: विखंडन (Fission) द्वारा अलैंगिक जनन होता है।

जीवाणु से होने वाला आर्थिक लाभ (Benefits):

  • (i) अपघटक (Decomposer): पारिस्थितिकी तंत्र में मृत जीव शरीर में फँसे कार्बनिक/अकार्बनिक तत्व को मिट्टी एवं वातावरण में मुक्त करते हैं।
  • (ii) नाइट्रोजन स्थिरीकरण: एजोटोबैक्टर, क्लोरास्ट्रीडियम, राइजोबियम (लेग्यूमिनोसीकुल के पौधा) हवा में उपस्थित स्वतंत्र नाइट्रोजन ग्रहण करके नाइट्रोजन यौगिक में बदलते हैं जो खेती के लिए लाभप्रद है।
  • (iii) ई. कोलाई (E. coli): मानव के पाचनतंत्र में पाये जाते हैं तथा पाचन क्रिया में सहायक है एवं हानिकारक जीवाणु को खाकर रक्षा करते हैं।
  • (iv) रोमन्थी जीव (जुगाली करने वाला जीव): उनके अमाशय में सेलुलोज पचाने वाला बैक्टीरिया होता है।
  • (v) दूध से दही: लैक्टोबैसिलस जीवाणु दूध के लैक्टोस शर्करा को लैक्टिक अम्ल में बदलता है।
  • (vi) जीवाणु द्वारा मक्खन तथा पनीर में विशेष सुगंधी (राइपेनिंग/Ripening) लायी जाती है।
  • (vii) बेसीलस मेगाथीरियम, माइक्रो कोक्कस: चाय तथा तंबाकू के पत्तों में सुगंध। जूट के रेशों को अलग करने, व चमड़े के शोधन में।
  • (viii) अधिकांश एंटीबायोटीक औषधि एवं टीका (Vaccine) जीवाणु से तैयार किये जाते हैं।

जीवाणु के प्रमुख हानिकारक क्रियाएँ:

  • 1. बहुत से जीवाणु विषैले पदार्थों को स्रावित कर खाद्य पदार्थों को विषाक्त बना देते हैं (Food poisoning)। जैसे—स्ट्रेप्टोकोक्कस, क्लोस्ट्रिडियम बोटुलिनियम आदि।
  • 2. कुछ जीवाणु मिट्टी में अवस्थित नाइट्रोजन यौगिक को स्वतंत्र नाइट्रोजन में बदल देते हैं जिससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है। इसे विनाइट्रीकारी (Denitrification) जीवाणु कहते हैं। जैसे— स्यूडोमोनस, थायोबसिलस
  • 3. स्पाइरोकीट साइटोफेज जीवाणु रुई के रेशों को नष्ट कर देते हैं।
  • 4. कुछ जीवाणु पेनिसिलेज नामक एंजाइम का निर्माण करते हैं जिससे पेनीसीलीन एंटीबायोटीक का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
जीवाणु द्वारा पौधों में होने वाले प्रमुख रोग:
  • आलू का विल्ट रोग या शैथिल रोग
  • गन्ना में लालधारी रोग
  • चावल का अंगमारी रोग
  • नींबू तथा टमाटर का कैंकर रोग
  • सेब और नाशपाती का निरजा या अग्निनिरजा रोग
  • बंदगोभी का काला विलगन रोग
  • गेहूँ का विलगन रोग
  • गेहूँ का टुण्डु रोग

जीवाणु द्वारा मानव में होने वाला प्रमुख रोग

क्षयरोग या टी.बी. (Tuberculosis)

  • यह रोग माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु शरीर में जहरीला पदार्थ ट्युबरकुलीन स्रावित करता है जो मुख्य रूप से फेफड़ा के कोशिका को नष्ट करने लगता है।
  • करीब 3 महीने से ज्यादा खांसी के साथ-साथ हल्का बुखार इसका प्रारंभिक लक्षण है। रोगी के थूक, कफ, खाँसी से फैलता है।
  • भारत की 10 प्रतिशत जनसंख्या इसकी चपेट में है तथा प्रतिवर्ष 5 प्रतिशत लोगों की मृत्यु टी.बी. के कारण होता है।
  • उपचार में दवाई का सेवन लम्बी अवधि तक अनिवार्य। बच्चों को जन्म के समय ही BCG (Bacillus Calmette Guerin) का टीका दिया जाता है। प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व टी.बी. दिवस मनाया जाता है।

टाइफाइड (Typhoid)

  • सलमोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया के कारण आंत का संक्रामक रोग
  • पेयजल, भोजन, दूध, कच्चा फल आदि से शरीर में प्रवेश। लक्षण: कमजोरी, सिरदर्द, तेज बुखार
  • बचाव हेतु 3 वर्ष के बाद TAB (typhoid antibacterial) टीका लगवाना चाहिए।

न्यूमोनिया (Pneumonia)

  • स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी जीवाणु के कारण।
  • फेफड़ा में स्थित वायुकोष्ठ (Alveoli) का तरल सूख जाते हैं, जिससे साँस लेने में कठिनाई।
  • ज्वर, खाँसी, सिरदर्द सामान्य लक्षण हैं।

हैजा (Cholera)

  • विब्रियो कॉलेरी नामक जीवाणु (आंत में संक्रामक)।
  • विषाक्त पदार्थ स्रावित, रोगी को बार-बार पानी जैसा पाखाना (दस्त) और उल्टी। टीका उपलब्ध है।

एंथ्रेक्स (Anthrax)

  • बैसिलस एंथ्रेसिस जीवाणु।
  • प्राय: पालतू पशु (गाय, भैंस, बकरी) से मनुष्यों में। लक्षण: सर्दी, साँस में दिक्कत, भूख कमी।
मनुष्य में जीवाणु द्वारा होने वाल अन्य रोग: डिप्थीरिया, प्लेग, टिटनस, कालीखाँसी, कोढ़ (Leprosy)।

Germ Theory of Disease: रॉबर्ट कोच ने सर्वप्रथम पता लगाया कि सूक्ष्मजीव मानव में रोग फैलाते हैं। उन्होंने एंथ्रेक्स रोग के जीवाणु का पता लगाकर प्रमाणित किया। इस मत को 'Germ Theory of Disease' कहते हैं।

प्रोटिस्टा जगत प्रमुख सूक्ष्मजीव

  • इस वर्ग में जलीय, एककोशिकीय तथा यूकैरियोटिक कोशिका का बना होता है। प्रचलन अंग के रूप में सीलिया, फ्लैजिला तथा कूट पाद पाये जाते हैं।
  • सूक्ष्मजीव स्वपोषी तथा परपोषी दोनों स्वभाव के होते हैं। स्वपोषी प्रोटिस्ट मुख्य रूप से एककोशिकीय शैवाल आते हैं। परपोषी के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के प्रोटोजोआ आते हैं:

1. यूग्लीना (Euglena)

  • एककोशिकीय मुक्तजीवी, प्रचलन अंग फ्लेजिला
  • स्वपोषी तथा परपोषी दोनों। पौधे के समान क्लोरोफील पिगमेंट होते हैं (प्रकाश-संश्लेषण में समर्थ)।
  • इसे पौधा तथा जंतु के बीच का योजक कड़ी माना जाता है। कोशिका भित्ति नहीं पायी जाती है।

2. पैरामीशियम (Paramecium)

  • एक प्रोटोजोआ है जिसमें सीलिया के द्वारा प्रचलन होता है।
  • इसका आकार चप्पल से मिलता है जिसके कारण इसे चप्पल जंतु भी कहते हैं।

3. प्लाज्मोडियम (Plasmodium)

  • यह परजीवी मलेरिया रोग फैलाता है। जीवनचक्र दो पोषक में पूरा होता है: मुख्य पोषक मनुष्य, दूसरा पोषक मादा एनाफिलीज मच्छर
  • मनुष्य के RBC में मेरोज्वाइट (Merozoite) अवस्था में आता है तब RBC के हिमोग्लोबीन नष्ट होने लगता है। कंपकपी के साथ बुखार, RBC में कमी, प्लीहा का आकार बढ़ना
  • मशहूर दवा— कुनैन (सिनकोना की छाल से)। भारत में आर्टीथर (Artemisia पौधा से) दवा खोजी गई।
  • नाम मैकुलॉन द्वारा, परजीवी की खोज सी. एल. ए. लैवेरान (1907 नोबेल), तथा सर रोनाल्ड रॉस ने मलेरिया परजीवी व मच्छर संबंध बताया (1902 नोबेल)।

4. लीशमैनिया डोनोवानी (Leishmania donovani)

  • कालाजार रोग (Black fever)। संक्रमण बालू मक्खी (Sand fly) द्वारा।
  • मुख्य लक्षण: लगातार बुखार, खून की कमी (एनीमिया) जिगर और तिल्ली का बढ़ना।

5. ट्रिपैनोसोमा गैम्बिएन्स (Trypanosoma)

  • इससे Sleeping sickness (निद्रा रोग) होता है।
  • संक्रमण सी-सी मक्खी (Tse Tse fly) द्वारा। केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क को प्रभावित कर नष्ट करने लगता है (जानलेवा)।

6. एण्ट अमीबा जिन जिवैलिस (Entamoeba gingivalis)

  • यह अमीबा मनुष्य में पायरिया रोग का कारण है।
  • दाँत तथा मसूढ़ा खराब, दाँतों का सामान्य रोग।

7. एण्ट अमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica)

  • मनुष्य में अमीबीय पेचिश (Amoebic Dysentery) रोग। आंत की कोशिका को नष्ट।
  • मल के साथ रुधिर। दवा- टेरामाइसिन, एरिथ्रोमाइसिन

8. & 9. अमीबा कोलाई और अमीबा (Amoeba)

  • एण्ट अमीबा कोलाई: बड़ी आंत के कोलेन में। हानिकारक नहीं होता क्योंकि ऊतक क्षति नहीं करता; यह उपस्थित जीवाणु का भक्षण करता है।
  • अमीबा (Amoeba): जलीय क्षेत्र में। कूटपाद (Pseudopodia) द्वारा प्रचलन/भोजन ग्रहण। आकार निश्चित नहीं। कोशिका भित्ति नहीं, प्रोटोजोआ यूकैरियोट है।

कवक जगत (Fungi kingdom)

  • इस जगत में बहुकोशिकीय पौधों को रखा गया है। कोशिका भित्ति होती है परन्तु क्लोरोफील नहीं होती है, इसलिए ये पौधा न होकर कवक हैं।
  • कवक की कोशिका भित्ति सेलुलोज से न बनकर काइटीन की बनी होती है। जीवों की तरह इसमें ग्लाइकोजेन संचित भोजन के रूप में रहता है।
  • अधिकांश कवक बहुकोशिकीय (Multicellular) होते हैं, पर यीस्ट (Yeast) एककोशिकीय कवक है।
  • स्थान विशेष पर कवक: पेड़ की छाल (कोर्टीकोलस), गोबर (कोप्रोफिलस), चट्टान (सेक्सीकोल्स)
  • कवक का शरीर धागे के जाल समान कवक जाल (माइसीलीयम / Mycelium) कहलाता है। जाल से निकलने वाली तंतुमय संरचना हाइफा (Hypha) कहलाती है जो पोषक ग्रहण करती है।

प्रमुख लाभदायक कवक

  • 1. कवक का उपयोग भोजन के रूप में होता है। रोमेरिया, क्लेवेसिया, एगेरिकस कवक को मशरूम कहते हैं (मशरूम खाद्याछत्रक कवक है)।
  • 2. यीस्ट की प्रजाति (सेकरोमाइसीज सेरेवेसी) का उपयोग शराब, बियर तता डबल रोटी (नरम/स्पंजी) बनाने में।
  • 3. क्लेवीसेप्स परप्यूरिया कवक से Ergot प्राप्त (नशीले ड्रग)।
  • 4. प्रथम प्रतिजैविक पेनीसीलीन का निर्माण पेनीसीलीयम नोटेटम कवक से।
  • 5. यह पारिस्थितिकी तंत्र में अपघटक (Decomposer) की भूमिका अदा करते हैं।

प्रमुख हानिकारक कवक

  • 1. कवक से एल्फाटॉक्सिन विष स्रावित होता है जो पालतू पशु को हानि पहुँचाता है।
  • 2. कवक से विभ्रमी पदार्थ LSD (Lysergic acid diethylamide) प्राप्त होता है।

3. कवक द्वारा पौधों में होने वाला प्रमुख रोग:

  • (i) आलू का लेट ब्लाइट (Late Blight) रोग - फाइटोपथोरा इन्फेस्टेन्स कवक से
  • (ii) मूँगफली का टिक्का रोग - सार्कोस्पोरा पर्सेनेटा कवक से
  • (iii) गन्ने का लाल सड़न रोग
  • (iv) चने का विल्ट रोग
  • (v) बाजरे का ऑगर्ट रोग
  • (vi) धान का प्रध्वंस रोग (Blast of rice)
  • (vii) आलू का अंगमारी रोग
  • (viii) अंगूर का पाउडरी मिल्ड्यू
  • (ix) गेहूँ का लाल रस्ट
  • (x) सरसों का सफेद किट्ट रोग

4. कवक द्वारा मनुष्य में होने वाले प्रमुख रोग:

  • (i) एथलीट फुट - ट्राइकोफाइटॉन कवक से
  • (ii) खाज - सरकॉप्टस स्केबीज कवक से
  • (iii) दाद - ट्राइकोफाइटॉन कवक से
  • (iv) गंजापन - टिनिया केपेटिस कवक से
  • (v) एस्परजिलेसिस (फेफड़ा रोग)