- ● बहुकोशिकीय सजीव के शरीर में बहुत से अंग तंत्र होते हैं जो अलग-अलग कार्यों को संपादित करते है। सभी अंग तंत्रों के कार्यों के बीच समन्वयन (Co-ordination) तथा उनपर नियंत्रण करने हेतु बहुकोशिकीय सजीव में जटिल तंत्र बना होता है।
- ● पौधों तथा मानव शरीर में नियंत्रण तथा समन्वयन अलग-अलग तरीके से होता है। पौधों में नियंत्रण एवं समन्वयन कुछ गतियों (Plant Movement) तथा रसायनिक पदार्थ (Plant Hormone) के द्वारा सम्पन्न होता है। मानव शरीर में नियंत्रण तथा समन्वयन हेतु हॉर्मोन (Hormone) तथा तंत्रिका तंत्र (Narvous system) पाये जाते है।
पौधों में नियंत्रण एवं समन्वयन
● पौधा में नियंत्रण एवं समन्वयन हेतु तीन प्रकार की गति पायी जाती है। पौधा में पायी जानेवाली गति पौधा में वृद्धि और विकास से संबंधित है, न कि प्रचलन (स्थान परिवर्त्तन) से।
अनुवर्ती गति (Tropic Movement)
किसी बाहरी उद्दीपक (प्रकाश, ताप, मानव स्पर्श, जल आदि) के प्रति पौधो के किसी भाग (जड़, तना, पत्ती) में उत्पन्न गति को अनुवर्त्ती गति कहते हैं। अगर गति उद्दीपक की ओर होता है तो उसे धनात्मक अनुवर्त्तन कहते हैं अगर गति उद्दीपक से दूर हो तो ऋणात्मक अनुवर्त्तन कहलाते हैं।
- ◆ वातावरण में पाँच सामान्य उद्दीपक है। प्रकाश के कारण होनेवाली अनुवर्ती गति को प्रकाशानुवर्त्तन कहते हैं। उसी प्रकार गुरुत्व के कारण उत्पन्न गति को गुरुत्वानुवर्त्तन, रसायन के कारण उत्पन्न गति को रसायनानुवर्त्तन, जल के कारण उत्पन्न गति को जलानुवर्त्तन कहते हैं।
- ◆ पौधा का तना धनात्मक प्रकाशानुवर्त्ती प्रदर्शित करते हैं वही जड़ ऋणात्मक प्रकाशानुवर्त्ती प्रदर्शित करते हैं।
- ◆ तना ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्त्ती प्रदर्शित करते हैं तथा जड़ धनात्मक गुरुत्वानुवर्त्ती प्रदर्शित करते हैं।
- ◆ कमजोर पौधा जैसे- करैला, लौकी, मटर के टेन्ड्रिल धनात्मक स्पर्शानुवर्त्तन होते हैं जो किसी ठोस भाग के स्पर्श होते ही उनसे लिपट जाते हैं।
अनुकुंचन गति (Nastic Movement)
किसी बाहरी उद्दीपक के प्रति प्रतिक्रिया में पौधा के अंग की गति जिसमें उद्दीपक की दिशा द्वारा प्रतिक्रिया की दिशा निर्धारित नहीं होती है अनुकुंचन गति कहलाती है।
अँगुली से स्पर्श करने पर छुई मुई (मिमोसापुडिका) के पत्ते मुड़कर बंद हो जाते हैं। यह अनुकुंचन गति स्पर्शानुकुंचन कहलाता है।
अनुचलन (Tatic or Taxis Movement)
यह गति निम्न कुल के पौधे जैसे- शैवाल, युग्लीना तथा कुछ एककोशीय जीव में भी पाये जाते हैं यह गति भी बाहरी उद्दीपन के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं परंतु इस गति में स्थान परिवर्त्तन (locomotion) की क्रिया पायी जाती है।
● तीन गतियों के अलावे पौधों में कुछ रसायनिक पदार्थ बनते हैं जो पौधों में नियंत्रण एवं समन्वयन का काम करते हैं। इन रसायनिक पदार्थ को पादप हॉर्मोन कहते हैं। कुछ जीव वैज्ञानिक पादप हार्मोन को पाराहॉर्मोन तथा वृद्धि नियंत्रक रसायन भी कहते हैं। पौधा में निकलने वाले प्रमुख हॉर्मोन निम्नलिखित हैं-
1. ऑक्जिन (Auxin)
यह रसायन मुख्य रूप से तने के शीर्ष भाग में बनता है तथा तना, पत्ती, में वृद्धि कराता है। यह जड़ में भी वृद्धि करवाता है तथा यह बीज रहित फल का उत्पादन में सहायक होते हैं।
1. ऑक्जिन (Auxin)
यह रसायन मुख्य रूप से तने के शीर्ष भाग में बनता है तथा तना, पत्ती, में वृद्धि कराता है। यह जड़ में भी वृद्धि करवाता है तथा यह बीज रहित फल का उत्पादन में सहायक होते हैं।
2. जिबरेलिन्स (Gibberellins)
इस रसायन की खोज सर्वप्रथम जापान के टोकियो विश्वविद्यालय में जिबरैला नामक कवक में हुआ था। बाद में पता लगा कि यह रसायन पौधा में भी बनते हैं।
2. जिबरेलिन्स (Gibberellins)
इस रसायन की खोज सर्वप्रथम जापान के टोकियो विश्वविद्यालय में जिबरैला नामक कवक में हुआ था। बाद में पता लगा कि यह रसायन पौधा में भी बनते हैं।
3. साइटोकाइनिन (Cytokinin)
यह रसायन DNA में पाये जानेवाले नाइट्रोजन युक्त क्षार एडिनिन के समान है। इसका खोज मिलर ने मछली के शुक्राणु में किया था और इसका नाम काइनेटिन रखा, बाद में के समय में स्कूब नामक वैज्ञानिक इसका नाम साइटोकाइनिन रखा।
3. साइटोकाइनिन (Cytokinin)
यह रसायन DNA में पाये जानेवाले नाइट्रोजन युक्त क्षार एडिनिन के समान है। इसका खोज मिलर ने मछली के शुक्राणु में किया था और इसका नाम काइनेटिन रखा, बाद में के समय में स्कूब नामक वैज्ञानिक इसका नाम साइटोकाइनिन रखा।
4. एबसिसिक एसीड (Abscissic acid or ABA)
यह एक प्रकार का वृद्धिरोधक पदार्थ है जो पौधा में होनेवाली वृद्धि को रोकता है। इसका निर्माण पौधे के पत्ते, फल और तना में होता है।
5. इथाइलीन (Ethene or Ethylene)
यह फलों का पकाने वाला रसायन है जिसकी खोज सबसे पहले केले में हुआ था। कभी-कभी यह रसायन पौधे के वृद्धि को रोकता है, और फल तथा पत्तों को गिराता है।
4. एबसिसिक एसीड (Abscissic acid or ABA)
यह एक प्रकार का वृद्धिरोधक पदार्थ है जो पौधा में होनेवाली वृद्धि को रोकता है। इसका निर्माण पौधे के पत्ते, फल और तना में होता है।
5. इथाइलीन (Ethene or Ethylene)
यह फलों का पकाने वाला रसायन है जिसकी खोज सबसे पहले केले में हुआ था। कभी-कभी यह रसायन पौधे के वृद्धि को रोकता है, और फल तथा पत्तों को गिराता है।
पौधों में हॉर्मोन निकालने हेतु जंतुओं के तरह कोई अंतः स्रावी ग्रंथि नहीं होती है।
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वयन
- ●जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वयन हेतु अंतःस्रावी ग्रंथि तथा तंत्रिका तंत्र पाये जाते हैं।
- ●ग्रंथि दो प्रकार के होते हैं- अंतःस्रावी ग्रंथि तथा बाह्यस्रावी ग्रंथि। अंतःस्रावी ग्रंथि विभिन्न प्रकार के हॉर्मोन का स्राव करते हैं।
- ●अंतःस्रावी ग्रंथि को नलिका विहीन ग्रंथि भी कहते हैं। क्योंकि इसमें कोई नली नहीं पायी जाती है। इस ग्रंथि से हॉर्मोन निकलकर सीधे रक्त में आ जाते हैं तथा रक्त के द्वारा ही शरीर के विभिन्न भाग में पहुँचते हैं।
मनुष्य के प्रमुख अंतःस्रावी ग्रंथि
हाइपोथैलेमस ग्रंथि (Hypothalamus Gland)
यह अग्र मस्तिष्क (Fore Brain) में पाया जाता है। यह ग्रंथि शरीर में होने वलो सभी उपापचय (Metabolism) पर नियंत्रण रखता है। हाइपोथैलेमस ग्रंथि मस्तिष्क में पाये जाने वाले एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथि - पीयूष ग्रंथि की क्रिया को नियंत्रित करने हेतु release factor तथा Inhibitory Factor का निर्माण करता है।
●हाइपोथैलेमस ग्रंथि से दो हॉर्मोन का स्राव हाता है-
पीयूष ग्रंथि (Pitutary Gland)
यह ग्रंथि मस्तिष्क में पाया जाता है। सभी अंतःस्रावी ग्रंथि के तुलना में यह सबसे छोटी ग्रंथि है। इस ग्रंथि से कुल सात प्रकार के हॉर्मोन का स्राव होता है।
यह हॉर्मोन एक अन्य हॉर्मोन थाइरॉक्सीन के साथ मिलकर शरीर की वृद्धि एवं विकास को नियंत्रित करते हैं।
- ●इस हॉर्मोन की कमी से शरीर की वृद्धि रूक जाती है जिससे मनुष्यों में बौनापन (Dwarfism) हो जाता है।
- ●इस हॉर्मोन की अधिक स्राव से मनुष्य की लंबाई काफी बढ़ जाती है, हड्डी मोटा एवं भारी हो जाता है, इस अवस्था को Gigantism कहा जाता है।
यह हॉर्मोन त्वचा (Skin) के मेलोनोसाइट कोशिका में बनने वाले मेलालिन रंग पर नियंत्रण रखता है। यह हॉर्मोन का हमारे लिए कोई विशेष महत्व नहीं होता है।
Pineal gland (पीनियल ग्रंथि)
इस ग्रंथि के कार्य के बारे में कुछ भी स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है परंतु हाल के शोध-कार्य से मालूम हुआ है कि यह कोई स्राव उत्पन्न करता है। इस ग्रंथि से मिलेटोनिन तथा सिरोटिनिन हॉर्मोन का स्राव होता है।
थाइरॉइड या अवटु ग्रंथि (Thyroid gland)
थाइरॉइड ग्रंथि शरीर का सबसे बड़ी अंतः स्रावी ग्रंथि है। यह लगभग 2-2.5 cm लम्बा तथा 1-1.5 cm मोटा होता है। इस ग्रंथि से दो मुख्य हॉर्मोन स्रावित होता है।
- ●यह हॉर्मोन, हाइपोथैलेमस ग्रंथि तथा TSH के साथ मिलकर शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। शरीर के तापमान नियंत्रण की प्रक्रिया थर्मोरेगुलेशन कहलाता है।
- ●थाइरॉक्सीन हॉर्मोन भ्रूण अवस्था से लेकर वयस्क होने तक Growth Hormone का सहायता करता है जिससे शरीर में वृद्धि होती है।
- ●थाइरॉक्सीन के कमी से बच्चों में क्रेटिनिज्म रोग तथा बड़ों में इस हॉर्मोन की मात्रा अचानक बढ़ जाती है जिससे ग्रेभ की बिमारी हो जाती है। ग्रेभ की बिमारी में एक या दोनों आँखे बड़ी-बड़ी और बाहर निकली दिखाई पड़ती है।
पारा अवटु ग्रंथि (Parathyroid gland)
यह ग्रंथि थॉयराइड ग्रंथि के ऊपर चिपकी रहती है तथा इसकी संख्या दो होती है। इससे एक मात्र हॉर्मोन पाराथॉर्मोन का स्राव होता। यह हॉर्मोन हड्डी के टूटे-फूटे भाग से अतिरिक्त कैल्शियम हटाकर रक्त में डालता है। Parathormone की कमी से गठिया तथा अधिकता से Osteoporosis रोग हो सकता है।
अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)
यह ग्रंथि दोनों वृक्क (Kidney) के ऊपर चिपके रहता है। यह ग्रंथि की संख्या हमारे शरीर में दो है। किडनी के तरह यह ग्रंथि का आंतरिक भाग दो स्पष्ट भागों में विभक्त रहता है- Medula तथा Cortex। अधिवृक्क ग्रंथि से निम्न प्रकार के हॉर्मोन स्रावित होते हैं।
Pancreas (अग्न्याशय)
यह हमारे शरीर का मिश्रीत प्रवृत्ति की ग्रंथि है जो एंजाइम तथा हॉर्मोन दोनों को स्रावित करता है।
Testes (वृषण)
यह पुरूषों में पायी जाने वाली अंतःस्रावी-ग्रंथि है। इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोन ऐंड्रोजेन (पुरूष हॉर्मोन) कहलाता है।
Overy (अंडाशय)
यह महिलाओं में पायी जाने वाली अंतस्रावी ग्रंथि है। इसके द्वारा निम्न हार्मोन का स्राव होता है-
Placenta (जरायु)
गर्भधारण करने के उसे 4 सप्ताह बाद भ्रूण की कोशिका गर्भाशय (Uretes) की कोशिकाओं के साथ जुटकर जरायु का निर्माण करता है। Placenta के द्वारा निम्न हॉर्मोन स्रावित होते हैं-
थाइमस ग्रंथि (Thymus gland)
यह ग्रंथि हृदय तथा महाधमनी के ऊपर स्थित होता है। यह ग्रंथि युवाओं में सक्रिय रहता है तथा धीरे-धीरे इसका आकार घटते जाता है। वृद्धावस्था में यह ग्रंथि पूरी तरह से लुप्त हो जाती है। इस ग्रंथि से दो हार्मोन का स्राव होता है-
मानव का तंत्रिका तंत्र
(Narvous System of Human Body)
- ●तंत्रिका तंत्र मानव शरीर के अंदर होने वाली सभी क्रियाओं का समन्वयन (Co-ordination) करता है, तथा उन पर नियंत्रण (Control) रखता है। तंत्रिका तंत्र की सहायता से मानव बाहरी तथा भीतरी उद्दीपनों को ग्रहण कर उनके अनुकूल कार्य करने में सक्षम हो पाता है।
- ●तंत्रिका तंत्र, तंत्रिका उत्तक (Narvous Tissue) का बना होता है एवं तंत्रिका उत्तक, तंत्रिका कोशिका का बना होता है। तंत्रिका कोशिका को न्यूरॉन (Neurone) कहते हैं। न्यूरॉन को तंत्रिका तंत्र की रचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई कहा जाता है।
- ●मानव के तंत्रिका तंत्र को जीव वैज्ञानिक ने तीन भागों में बाँटा है, ये है-
1. Central Narvous system. 2. Peripheral Narvous system. 3. Autonomous Narvous system.
तंत्रिका कोशिका
(Neurone - cell)
- ■न्यूरॉन को जब सूक्ष्मदर्शी से देखा जाय तो इसके दो स्पष्ट भाग दिखाई पड़ते हैं। ये है- 1. साइटॉन (Cyton or Cell-body) तथा 2. तंत्रिका तंतु (Nerves fibres)।
- ■न्यूरॉन का मुख्य भाग साइटॉन है। इस कोशिका का केन्द्रक साइटॉन वाले भाग में स्थित रहता है। साइटॉन वाले भाग के कोशिका द्रव्य में अनेक कण समान संरचना पायी जाती है- जिसे निसेल ग्रेन्यूल (Nissl's Granules) कहते हैं।
- ■साइटॉन के चारों ओर पतले-पतले तंतु समान संरचना को तंत्रिका तंतु (Nerves-fibres) या कोशिका प्रवर्ध (Cell Processes) कहते हैं। तंत्रिका तंतु दो प्रकार के होते हैं- डेन्ड्रॉन (Dendrone) तथा एक्सॉन (Axon)।
- ■साइटॉन से निकलने वाली सूक्ष्म-सूक्ष्म तंतु को डेन्ड्रॉन कहते हैं, पुनः डेन्ड्रॉन छोटी-छोटी शाखाओं में बँट जाती है जिसे डेन्ड्राइट्स (Dendrites) कहते है।
- ■साइटॉन से निकलने वाले लम्बे आकार के तंतु को एक्सॉन कहते है। एक्सॉन के अंतिम सिरे से कई तंतुएँ निकलती है जिसे सिनेप्टिक नोब (Synaptic Knob) कहते है।
- ■न्यूरॉन के एक्सॉन वाले भाग के ऊपर सफेद रंग के चर्बीदार पदार्थ का आवरण रहता है, जिसे मेडुलरी या मायलीन शीथ (Medullary or myelin sheath) कहते हैं। एक्सॉन के जिस जगह पर मायलीन शीथ नहीं रहते हैं, उस जगह को रेनबियर के नोड (nodes of Ranvier) कहते है।
- ■एक्सॉन के मायलीन शीथ परत के ऊपर एक पतली झिल्ली होती है जिसे न्यूरिलेमा (Neurilemma) कहते है। न्यूरिलेमा एक खास प्रकार के कोशिका से निर्मित होती है, इन कोशिकाओं को श्वान कोशिका (Schewann cells) कहते है।
- ■एक न्यूरॉन का एक्सॉन, दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट्स से जुड़ा रहता है। इस जोड़ को सिनैप्स (Synapse) कहा जाता है।
- 1. Sensory Neuron- यह न्यूरॉन शरीर के संवेदी अंग (आँख, नाक, कान, त्वचा तथा जीभ) से संवेदना को ग्रहण कर, उसे मस्तिष्क तक पहुँचाते है। मस्तिष्क इन संवेदनाओं को ग्रहण कर उसका विश्लेषण करता है तथा शरीर के अंगों को उचित निर्देश देता है।
- 2. Motor Neuron- यह न्यूरॉन मस्तिष्क के निर्देश को शरीर मे विभिन्न अंगों तक पहुँचाते है।
- ■उपर्युक्त दो प्रकार के न्यूरॉन के अतिरिक्त कुछ ऐसे न्यूरॉन होते हैं जो Sensory Neuron तथा Motor Neuron के कार्यों के बीच सामंजस्य स्थापित कराता है, जिसे Adjustor Neuron कहते हैं।
- ■
संवेदनाओं तथा मस्तिष्क के निर्देशों का न्यूरॉन से होकर तीव्र गति से प्रवाह कराने हेतु सिनैप्स वाले स्थान पर न्यूरॉन के एक्सॉन के सिनेप्टिक नोब से कुछ पदार्थ स्रावित होता है, जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहते है। न्यूरोट्रांसमीटर दो प्रकार के होते है-
- 1. Acetylcholone- उस पदार्थ की कमी होने पर अलजाईमर रोग हो जाता है, जिसमें मनुष्य की यादाश्त में कमी आने लगती है।
- 2. Dopamin- इस रसायनिक पदार्थ की कमी से पर्कीसन रोग होता है, जिसमें मनुष्य के हाथ तथा पैर में थरथराहट होते रहता है।
- ■न्यूरॉन में संवेदनाओं का ग्रहण डेन्ड्राइट्स के द्वारा होता है। डेन्ड्राइट्स इन संवेदना को साइटॉन को भेज देता है। साइटॉन में संवेदना, विद्युत आवेग (Impulse) में बदल जाता है। विद्युत आवेग साइटॉन से एक्सॉन में पहुँच जाता है और फिर एक्सॉन से दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट्स में।
- ■विद्युत आवेग (Impulse) का संचार हमेशा एक न्यूरॉन के एक्सॉन से इससे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट्स में होता है, न कि इसके विपरित।
- ■तंत्रिका कोशिका (Neuron) एक विशेष प्रकार के संयोजी उत्तक द्वारा आपस में जुड़ी रहती है। इन संयोजी उत्तक को न्यूरोग्लिया (Neuroglia) कहते है।
1. Central Narvous system
( केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र )
- ●केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के अंतर्गत मस्तिष्क (Brain) तथा मेरुरज्जु (Spinal Cord) आते है।
- ●मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के सुरक्षा हेतु इस पर तीन झिल्लियों का एक परत चढ़ा रहता है। तीन झिल्लियों में सबसे आंतरिक झिल्ली को पायमेटर (Piamater), मध्य झिल्ली को अरैकनॉइड (Arachnoid) तथा बाहरी झिल्ली को डूरमेटर (Duramatter) कहते है। इन तीनों झिल्ली को सम्मिलित रूप से मेनिन्जेज (Meninges) कहते है।
- ●मस्तिष्क के पायमेटर तथा अरैकनॉइड झिल्ली के बीच एक तरल पदार्थ पाये जाते हैं जिसे सेरीब्रोस्पाइनल द्रव (Cerebrospinal fluid) कहते हैं यह द्रव (Fluid) मस्तिष्क का पोषण, श्वसन गैसों तथा अन्य पदार्थों के परिवहन के लिए माध्यम का कार्य करता है।
- ●केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र, सबसे प्रमुख तंत्रिका तंत्र है। अन्य दो तंत्रिका तंत्र, केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में कार्य करते है।
मस्तिष्क (Brain)
- ●मानव मस्तिष्क एक कोमल अंग है जिसकी संरचना अत्यंत ही जटिल होती है। मानव मस्तिष्क का औसत आयतन 1650 ml तथा औसत भार 1.5 kg होता है। मस्तिष्क 6 वर्ष की उम्र तक पूर्ण विकसित हो जाता है।
- ●मस्तिष्क केन्द्रीय तंत्रिका का अग्र भाग है जो खोपड़ी के मस्तिष्क गुहा (Cranium) के अंदर सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क गुहा में हड्डीयों की संख्या आठ होती है।
- ●मानव मस्तिष्क तीन भागों में बँटे होते हैं- अग्र मस्तिष्क (Fore Brain), मध्य मस्तिष्क (Mid Brain) तथा पश्च मस्तिष्क (Hind Brain)। मध्य तथा पश्च मस्तिष्क को सम्मीलित रूप से मस्तिष्क स्टेम (Brain stem) कहते है।
1. सेरीब्रम (Cerebrum) :
- ◆सेरीब्रम मस्तिष्क का सबसे बड़ा तथा सबसे महत्वपूर्ण भाग है। पूरे मस्तिष्क का दो-तिहाई हिस्सा सेरीब्रम ही होता है।
- ◆सेरीब्रम दो बाएँ तथा दाएँ अर्धगोलों में बँटा रहता है जिसे सेरीब्रम हेमीस्फीयर (Cerebral hemisphere) कहते है। दोनों सेरीब्रल हेमीस्फीयर कॉर्पस कैलोसम नामक संरचना द्वारा आपस में जुड़ा रहता है।
- ◆सेरीब्रम को अगर बीचो-बीच काटा जाए तो अंदर में धूसर (Gray) तथा सफेद रंग के पदार्थ दिखाई देते हैं। धूसर रंग के पदार्थ को कॉर्टेक्स (Cortex) तथा सफेद रंग के पदार्थ को मेडुला (Medula) कहते है।
- ◆सेरीब्रम के ऊपरी सतह पर अनेक उभार जैसी संरचना पायी जाती है। इन संरचनाओं को गाइरस (Gyrus) कहते है। दो गाइरस के बीच के खाँचे को सल्कस (Sulcus) कहते है। सल्कस तथा गाइरस सेरीब्रम के कॉर्टेक्स वाले भाग में होते हैं।
- ◆सेरीब्रम बुद्धि, चतुराई, सोचने-समझने तथा स्मरण-शक्ति का केन्द्र है। प्रेरणा, घृणा, प्रेम, भय, हर्ष, कष्ट तथा अनुभव जैसी क्रियाओं का नियंत्रण इसी भाग से होता है।
- ◆सेरीब्रम सभी प्रकार के चेतना शक्ति का केन्द्र है। अगर भाग ठीक से काम न करे तो जीवित होने के बावजूद मानव की सारी समझ समाप्त हो जाएगी।
2. डाइएनसफेलॉन (Diencephalon) :
- ◆यह भाग सेरीब्रल हेमीस्फीयर द्वारा ढकाँ रहता है। इसके दो भाग होते हैं थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस।
- ◆थैलेमस सेरीब्रल हेमीस्फीयर में लिपटा रहता है। थैलेमस संवेदी तथा प्रेरक संकेतों का मुख्य सम्पर्क स्थल है।
- ◆हाइपोथैलेमस द्वारा शरीर के तापमान तथा खाने-पीने का नियंत्रण होता है। इस भाग में कुछ हॉर्मोन भी बनते है।
- ◆सेरीब्रम (Cerebrum) के आंतरिक भाग आंतरिक अंग से जुटकर एक जटिल तंत्र बनाता है, जिसे लिबिंक तंत्र कहते है। हाइपोथैलेमस लिबिंक तंत्र के साथ मिलकर लैंगिक व्यवहार मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति जैसे- उत्तेजना, खुशी, गुस्सा और भय आदि का नियंत्रण करता है।
● मस्तिष्क के मध्य भाग (Mid Brain)-
- ◆मध्य मस्तिष्क का सबसे छोटा हिस्सा है, यह अग्र एवं पश्च मस्तिष्क के बीच में स्थित रहता है।
- ◆मध्य मस्तिष्क में चार गोलाकार संरचना पायी जाती है। इस गोलाकार संरचनाओं को कॉरपोरा क्वाड्रिगेनिया कहते है।
- ◆दोनों ओर (बायीं तथा दायीं) के कॉरपोरा क्वाड्रिगेनिया आपस में क्रूरा सेरेब्री नामक संरचना द्वारा आपस में जुटे होते हैं।
- ◆मध्य मस्तिष्क आँखों के देखने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं तथा संतुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।
● मस्तिष्क के पश्च भाग (Hind Brain)-
1. सेरीबेलम (Cerebalum)-
- ■सेरीबेलम सुनने और शरीर को संतुलित रखने का काम करता है। यह समन्वयन संतुलन, ऐच्छीक पेशियों के गति को नियंत्रित करता है। सेरीबेलम जीभ तथा जबड़े के पेशियों पर भी नियंत्रण रखता है जिसके कारण बोलना संभव हो पाता है।
- ■सेरीबेलम पाँच गुच्छों में बँटा रहता है। इस भाग के नष्ट होने अथवा इसमें खराबी आने पर सभी प्रकार के ऐच्छीक गतियाँ जैसे- चलना, बोलना, सुना, असंभव हो जाएगा।
2. पॉन्स (Pons)-
- ■मस्तिष्क का यह भाग श्वसन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
3. मेडुला ऑब्लॉगेटा (Medula oblongata)-
- ■इस भाग की संरचना बेलनाकार होता है। यह हृदय की धड़कन, रक्तचाप (Blood Pressure), तथा श्वसन गति को नियंत्रित करते है।
- ■इस भाग द्वारा खाँसना, छींकना, उल्टी करना (Vomiting), पाचक रसों का स्राव का भी नियंत्रण होता है।
मेरूरज्जु (Spinal Cord)
- ●मस्तिष्क का पीछला भाग (Medula Oblongata) डण्ठल के रूप में खोपड़ी से बाहर निकलकर रीढ़ के न्यूरल कैनाल में प्रवेश कर जाती है, इसे ही मेरूरज्जु (Spinal Cord) कहते है।
- ●मेरूरज्जु 4 से 5 वर्ष की अवस्था में पूर्ण विकसित हो जाते हैं, उसके बाद इसमें वृद्धि रूक जाती है। मेरूरज्जु मस्तिष्क से निकलते समय मोटी रहती है और रीढ़ में प्रवेश के बाद धीरे-धीरे पतली हाते जाती है तथा रीढ़ की अंतिम हड्डी तक जाते जाते बहुत पतली हो जाती है। मेरूरज्जु रीढ़ के सभी हड्डी तक फैला रहता है।
● मेरूरज्जु के संरचना के प्रमुख भाग-
- 1. Central Canal : यह मेरूरज्जु का मध्य भाग है।
- 2. Posterior and anterior fissure : यह मेरूरज्जु के मध्य भाग से निकला हुआ संरचना है।
- 3. Grey Matter : यह Central Canal के चारों ओर अंग्रेजी वर्णमाला के H अक्षर के तरह फैला रहता है।
- 4. White matter : यह Grey matter के चारों तरफ फैला रहता है।
- 5. Posterior and anterior horn : Grey matter दो Posterior तथा दो Anterior horn का निर्माण करता है।
- ●मेरूरज्जु के दोनों ओर से सभी रीढ़ की हड्डी के जोड़ पर एक-एक जोड़े स्पाइनल तंत्रिकाएँ (Spinal Nerves) उत्पन्न होता है। ये स्पाइनल तंत्रिकाएँ आसपास के अंगों में फैला रहता है तथा उनकी क्रिया को नियंत्रित करता है। मानव में कुल 31 जोड़े स्पाइनल तंत्रिकाएँ होते हैं।
- ●प्रत्येक स्पाइनल तंत्रिका के दो हिस्से हो हैं- Dorsal horn (डॉर्मल हॉर्न) तथा Ventral horn (भेंट्रल हॉर्न)। डॉर्सल हॉर्न से संवेदी न्यूरॉन (Sensory or Afferent neuron) बनता है तथा भेंट्रल हॉर्न से मोटर न्यूरॉन (Motor or Efferent nuron) बनता है।
- ●मेरूरज्जु, तंत्रिकाओं (Nerves) तथा मस्तिष्क के बीच कड़ी (Connecting link) का काम करता है। यह सभी प्रकार के प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex action) का नियंत्रण केन्द्र है।
प्रत्यावर्ती क्रिया (Reflex action)
प्रत्यावर्ती क्रिया वे अनैच्छिक क्रिया है जो किसी उद्दीपन के प्रतिक्रिया क्षणभर में बिना सोचे समझे हमारा शरीर स्वयं कर देता है। उदाहरण-
- ◆ठोकर खाते ही लड़खड़ा कर अपने-आप शरीर का संभल जाना।
- ◆आँखों के सामने कीड़ा आने पर आँखों का पलक का स्वयं बंद हो जाना।
प्रतिवर्ती चाप (Reflex arc)
- ●संवेदी अंगों से मस्तिष्क तक संवेदनाओं का संचार तथा मस्तिष्क द्वारा अंगों को निर्गत आदेश का गमण न्यूरॉन के माध्यम से होता है।
- ●न्यूरॉन में आवेग का संचरण एक निश्चित पथ से होता है। इसी पथ को प्रतिवर्ती चाप (Refflex arc) कहते है। प्रतिवर्ती चाप में निम्नलिखित भाग होते हैं-
- 1. Receptor- यह त्वचा, पेशी तथा अंगों में उपस्थित रहते हैं तथा विभिन्न प्रकार के उद्दीपन को ग्रहण करते है।
- 2. Sensory Path- रिसेप्टर्स द्वारा ग्रहण किया संवेदना (उद्दीपन) का संचरण संवेदी न्यूरॉन (Sensory neuron) में होता है। संवेदी न्यूरॉन ही Sensory path का निर्माण करता है।
- 3. Nerve Centres- मस्तिष्क तथा मेरूज्जु को ही Nerve Centre कहते है। यह Sensory Path से आये संवेदनाओं को प्राप्त कर विश्लेषण करते हैं तथा इसके बाद उचित निर्णय देते है।
- 4. Motor Path- Nerve Centres से प्राप्त निर्देशों को मोटर न्यूरॉन ग्रहण करता है और Motor Path का निर्माण करता है।
- 5. Effectors- Motor Path से मस्तिष्क का निर्देश Effectors में पहुँचते है और यह निर्देश के अनुसार प्रतिक्रिया करते है। Effectors (अभिवाही अंग) पेशियाँ (Muscles) होता है।
2. Peripharal Narvous System
( परिधीय तंत्रिका तंत्र )
- ●शरीर के विभिन्न अंगो को केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क तथा मेरूरज्जु) से जोड़ने वाले सभी तंत्रिका (Nerves) को सम्मीलित रूप से परिधीय तंत्रिका तंत्र कहते है।
- ●परिधीय तंत्रिका तंत्र के अंतर्गत मुख्य रूप से क्रनियल तंत्रिकाएँ तथा स्पाइनल तंत्रिकाएँ आते हैं। क्रैनियल तंत्रिकाएँ 12 जोड़े होते हैं तथा स्पाइनल तंत्रिकाएँ 31 जोड़े है।
- ●कैनियल तंत्रिकाएँ मस्तिष्क से जुड़े होते है। एक जोड़ी अग्र मस्तिष्क, 1 जोड़ी मध्य मस्तिष्क तथा 10 जोड़ी पश्च मस्तिष्क से जुड़े होते हैं।
- ●क्रैनियम तंत्रिकाएँ में पहला दूसरा तथा आठवाँ जोड़ा संवेदी (Sensory); सातवाँ, नवाँ तथा दसवाँ मिश्रित (Mixed) तथा शेष मोटर तंत्रिकाएँ होते हैं।
- ●मनुष्य के क्रेनियम तंत्रिकाएँ तथा उसका कार्य-
| क्रेनियम तंत्रिकाएँ | संबंधित अंग | क्रियाएँ |
|---|---|---|
| पहला जोड़ा - ऑलफैक्टरी | नासिका | सूँघने का नियंत्रण |
| दूसरा जोड़ा - ऑप्टिक | आँख | दृष्टि नियंत्रण |
| तीसरा जोड़ा - ऑकुलोमीटर | आँख की मांसपेशी | आँखों की गति का नियंत्रण |
| चौथा जोड़ा - ट्रोक्लींयर | ||
| पाँचवा जोड़ा - ट्राइजेमाइनल | जबड़ा चेहरा, त्वचा | जबड़ों की गति का नियंत्रण |
| छठाँ जोड़ा - एब्डुसेंस | आँख की मांसपेशी | आँखों की गति का नियंत्रण |
| सातवाँ जोड़ा - फेसियल | गला, चेहरा जीभ | |
| आठवाँ जोड़ा - ऑडिटरी | कान जीभ | |
| नवाँ जोड़ा - ग्लॉसौफैरेंजियल | सुनना तथा शरीर का संतुलन | |
| दसवाँ जोड़ा - भैगस | कंठ, स्वर यंत्र कंठ | स्वाद तथा गले की मांसपेशी का नियंत्रण |
| ग्यारहवाँ जोड़ा - एक्सेसरी | सिर, हृदय, आहार नली | |
| बारहवाँ जोड़ा - हाइपोग्लॉसल | जीभ गर्दन |
3. Autonomous Nervous System
( स्वायत्त तंत्रिका तंत्र )
- ●स्वायत्त तंत्रिका तंत्र शरीर के आंतरिक अंग (किडनी, अमाशय, हृदय आदि) के क्रियाओं का नियंत्रण करता है। इस तंत्र की तंत्रिकाएँ (Nerves) हमेशा बिना किसी बाधा के क्रियाशील रहती है, इसके कार्य पर हमारी सोच या इच्छा का सीधा नियंत्रण नहीं रहता है।
- ●स्वायत्त तंत्रिका तंत्र द्वारा हृदय गति, आँखों के सिलयरी मांसपेशी तथा आइरिस की गति, पसीने का निष्कासन आदि क्रियाओं का नियंत्रण होता है।
- ●स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को दो भागों में बाटा गया है, ये है- सिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र तथा पारा सिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र।
- ●सिम्पैथेटिक तथा पारासिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र के क्रियाएँ एक दूसरे के विपरित होती है तथा ये दोनों ही हमेशा क्रियाशील रहते है।