जैव विविधता शब्द का प्रयोग पृथ्वी पर पाये जाने वाले जीवों के विविधता के संदर्भ में किया जाता है।
● जैव विविधता शब्द का प्रयोग पृथ्वी पर पाये जाने वाले जीवों के विविधता के संदर्भ में किया जाता है। जैव विविधता में प्राणियों में पाए जाने वाले समस्त जीन, समस्त जातियाँ तथा पारिस्थितिक तंत्र समाहित है।
● 1992 में रियो डि जनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता को निम्न तरीके से परिभाषित किया गया-
● जैव विविधता (Biological diversity) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नार्स तथा मैकमेन्स ने किया था। आगे चलकर डब्ल्यू. जी. रोजेने ने 'Biological diversity' शब्द को संक्षिप्त कर 'Biodiversity' शब्द दिया।
◆ अनुवांशिक विविधता का आशय एक ही जाति के जीवों के जीन में पाई जाने वाली विविधता से है एक जाति के सदस्य लगभग हर दृष्टिकोण से समान होते हैं फिर भी उनमें कुछ अंतर जरूर होता है।
◆ जातियों में पाये जाने वाले अनुवांशिक विविधता का बहुत अधिक महत्व है। जिस जाति में अनुवांशिक विविधता अधिक होती है उसके अंदर पर्यावरण में होने वाले बदलाव के लिए अनुकूलन करने की क्षमता अधिक होती है।
◆ हमलोग विभिन्न किस्म के आम, चावल, बैंगन आदि खाते हैं यह अनुवांशिक विविधता का ही परिणाम है। भारत में 1000 से भी ज्यादा आम का किस्म पाया जाता है। वही धान के लगभग 50,000 किस्म का पता लगाया गया है।
◆ भारत के हरित क्रांति अनुवांशिक विविधता का ही परिणाम है क्योंकि एक ही जाति की विभिन्न किस्म में पाई जाने वाली विविधता का इस्तेमाल कर एक उन्नत किस्म तैयार की जाती है।
◆ किसी पारिस्थितिकी तंत्र के समुदाय के जातियों में जो विविधता मौजूद है उसे जाति या प्रजाति विविधता कहा जाता है। प्रजाति विविधता से हमें यह पता चलता है कि एक समुदाय में कितने प्रकार की जातियाँ मौजूद है।
◆ पृथ्वी पर सर्वाधिक जातीय विविधता उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। इस क्षेत्र में जातीय विविधता सर्वाधिक होने के निम्न कारण हैं-
◆ एक पारिस्थितिकी तंत्र या एक प्रकार के आवास में रहने वाले जीवों समुदाय तथा दूसरे पारिस्थितिकी तंत्र या दूसरे प्रकार के आवास में निवास करने वाले जीवों के समुदाय में जो विविधता पायी जाती है, उसे पारिस्थितिकी विविधता कहते हैं। पारिस्थितिकी विविधता को समुदाय विविधता भी कहा जाता है।
◆ विभिन्न प्रकार के आवास तथा निकेत ही पारिस्थितिकी विविधता के लिये उत्तरदायी होते हैं, इसके अतिरिक्त पोषणचक्र, आहार श्रृंखला तथा ऊर्जा प्रवाह में होने वाला परिवर्तन पारिस्थितिक विविधता को बढ़ावा देता है।
◆ पारिस्थितिकी विविधता को तीन प्रकार में विभाजित किया गया है, अल्फा विविधता, बीटा विविधता तथा गामा विविधता।
● पृथ्वी पर हर जगह जैव विविधता एक समान नहीं है। उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर तथा अथवा ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर जैव विविधता में वृद्धि होती है। इसी प्रकार पर्वतीय क्षेत्रों में जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है जैव विविधता में कमी आने लगता है।
● अक्षांशों में प्रायः उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर तथा पर्वतीय क्षेत्रों में ऊपर से नीचे की ओर आने पर प्रजातियों के संख्या में अंतर ही “जैव विविधता प्रवणता” कहलाता है।
● जैव विविधता प्रवणता का मुख्य कारण यह है कि कहीं प्रजातियों के लिए विकास की परिस्थितियाँ पर्याप्त है तो कहीं बहुत कठोर परिस्थितियाँ है जहाँ प्रजातियों के जीवित रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
● विश्व में अब तक ज्ञात जीवित स्पीशीज (जाति) की संख्या लगभग 1.8 मिलियन (18 लाख) है, जिनमें 70 प्रतिशत से अधिक ज्ञात स्पीशीज जंतुओं (Animal) की है, जबकि पौधे जिनमें शैवाल, कवक, ब्रायोफाइट्स, टेरिडोफाइट्स, आग्नेयबीजी तथा अनावृतबीजी सम्मिलित है उनका प्रतिशत 22 है। शेष प्रजाति सूक्ष्मजीवों की है।
● ‘रॉबर्ट मे’ के अनुमान के मुताबिक विश्व के अभी 22 प्रतिशत स्पीशीज का पता लगाया जा सका है, अभी भी अनेकों प्रजाति का पता लगाना बाकी है। रॉबर्ट मे के अनुसार विश्व में जातीय विविधता लगभग 7 मिलियन है।
● भारत विश्व के जैव विविधता बहुल क्षेत्रों में से एक है। विश्व के 17 बड़े जैव विविधता वाले क्षेत्रों में भारत भी शामिल है। जैव विविधता की दृष्टि से भारत विश्व के 10 तथा एशिया के 4 शीर्ष देशों में शामिल है।
● IUCN के अनुसार भारत में जीवों की 91,000 प्रजातियाँ पायी जाती है, इसके अलावे भारत में पादपों की लगभग 47,500 प्रजातियाँ पायी जाती है। भारत में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीव, पौधा, जन्तु की प्रजाति की अनुमानित संख्या निम्न है-
| टैक्सॉन | स्पीशीज की संख्या |
|---|---|
| 1. जीवाणु | 850 |
| 2. शैवाल | 12480 |
| 3. कवक | 23,000 |
| 4. लाइकेन | 2000 |
| 5. ब्रायोफाइट्स | 2850 |
| 6. टेरिडोफाइट्स | 1100 |
| 7. अनावृतबीजी | 64 |
| 8. आग्नेयबीजी | 17500 |
| 9. कीट | 68389 |
| 10. मत्स्य | 2546 |
| 11. उभयचर | 309 |
| 12. सरीसृप | 456 |
| 13. पक्षी | 1232 |
| 14. स्तनधारी | 390 |
| भौगोलिक क्षेत्र | जैव विविधता का प्रतिशत |
|---|---|
| 1. पश्चिमी हिमालय | 10% |
| 2. मध्य भारत तथा गंगा का मैदानी क्षेत्र | 9% |
| 3. पश्चिमी मरुस्थलीय भाग | 1% |
| 4. पूर्वी घाट | 24% |
| 5. पश्चिमी घाट | 26% |
| 6. उत्तर-पूर्व | 30% |
| 7. शेष भाग | 10% |
● भारत के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु में भिन्नता के कारण जन्तुओं एवं वनस्पतियों की प्रजातियों में विविधता पाई जाती है। जैव विविधता की दृष्टि से भारत के 10 जैव भौगोलिक क्षेत्र है जिनमें जलवायु, स्थलाकृति, मृदा आदि में भिन्नता पायी जाती है।
● जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन का आधार है जो मनुष्य के लिए अपना अस्तित्व बनाये रखने में अत्यधिक सहायक है। मनुष्य की लगभग सभी आवश्यकता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पृथ्वी पर पायी जाने वाले विशाल जैव विविधता से ही प्राप्त होता है।
● पृथ्वी की जैव विविधता का बहुत ही तीव्रगति से ह्रास हो रहा है। कई जन्तु तथा पादपों की जातियाँ पृथ्वी से विलुप्त हो गये हैं और कई विलुप्त के कगार पर है। जैव विविधता के ह्रास होने के कई कारण है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण है मानव की अपनी गतिविधियाँ। मनुष्य अपनी जनसंख्या बेतहाशा तरीके से बढ़ा रहा है और आवश्यकता की पूर्ति के लिए जैव विविधता का अत्यधिक दोहन कर रहा है। जैव विविधता के ह्रास होने का प्रमुख कारण निम्न है-
● जैव विविधता संरक्षण वे उपाय है जिनके द्वारा पौधों एवं जन्तुओं को लगातार जीवित रखना, उनकी उचित वृद्धि तथा विकास एवं प्रजनन को सुनिश्चित किया जाता है। जैव विविधता संरक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्न है-
जब जीव जन्तु एवं एवं वनस्पतियों का संरक्षण उनके अपने प्राकृतिक आवास में किया जाता है तो इसे स्व स्थानों संरक्षण कहा जाता है। स्व स्थाने संरक्षण काफी सस्ता तथा आसान तरीका है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैव मंडल आगर (Biosphere Reserve) आदि आते हैं।
कभी-कभी स्थितियाँ ऐसी आ जाती है, कि पौधे या जंतु संकटग्रस्त या आपत्तिग्रस्त होने में आ जाते हैं और उनका विलुप्त होने का खतरा प्रबल हो जाता है। इस स्थिति में जंतु या पौधों को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर अन्यत्र ले जाकर संरक्षण करना पड़ता है। इस तरह के संरक्षण को बाहा स्थाने संरक्षण कहा जाता है। इसके अंतर्गत वनस्पतिक उद्यान, जंतु उद्यान, चिड़ियाघर, बीज बैंक, जीन बैंक, क्रायोप्रिजर्वेशन शामिल है।
◆ ऐसे प्राकृतिक पारिस्थिति तंत्र जो जैव विविधता से समृद्ध होते हैं और उसका संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक होता है, उस क्षेत्र को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत राज्य राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर सकता है।
◆ राष्ट्रीय उद्यान घोषित क्षेत्र में जंतुओं का शिकार प्रतिबंधित रहता है तथा राष्ट्रीय उद्यान के वन्य जीवों के अलावा अन्य जीवों के चरण पर भी प्रतिबंध होता है। इन क्षेत्रों में किसी भी तरह के हथियार का प्रयोग वर्जित रहता है।
◆ वर्तमान में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या भारत में 94 से बढ़कर 103 हो गई है। जिनमें सर्वाधिक राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में है।
◆ भारत का सर्वप्रथम राष्ट्रीय उद्यान हैल्टी नेशनल पार्क है जो 1936 में बनाया गया था। वर्तमान में इसे जिम कार्बेट नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है।
◆ अगर राज्य किसी क्षेत्र को जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता हो तो उसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत वन्यजीव अभयारण्य घोषित कर सकता है।
◆ वन्यजीव अभयारण्य में मानव गतिविधि की अनुमति दी जाती है। इन क्षेत्रों में जानवरों को चराने, लकड़ी इकट्ठा करने तथा पर्यटन की अनुमति होती है परंतु मानव का बसना प्रतिबंधित होता है।
◆ वन्यजीव अभयारण्य का गठन किसी विशेष प्रजाति को संरक्षण देने हेतु किया जाता है। जैसे- एशियाई शेर को संरक्षण देने हेतु गिर वन्य जीव अभयारण्य (गुजरात) का गठन, ठीक उसी तरह बाघ को संरक्षण देने हेतु पन्ना (मध्य प्रदेश), सिमलीपाल (ओडिशा) वन्य जीव अभयारण्य का गठन किया गया है।
◆ सरकार वन्यजीव अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यान भी घोषित कर सकती है परंतु राष्ट्रीय उद्यान को वन्यजीव अभयारण्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
◆ भारत में वर्तमान समय में 543 वन्यजीव अभयारण्य हैं जिनमें टाइगर तथा पक्षी अभयारण्य भी शामिल है।
◆ बायोस्फीयर रिजर्व अवधारणा का विकास 1975 में यूनेस्को के द्वारा किया गया है। यह क्षेत्र प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक भू-दृश्य का प्रतिनिधि क्षेत्र है जो स्थलीय, जलीय भाग में फैले होते हैं। बायोस्फीयर रिजर्व में न सिर्फ जैव विविधता को संरक्षित किया जाता है बल्कि यह परंपरागत संसाधनों के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ ही परितंत्र के कार्यप्रणाली और प्रारूप को समझने में मदद करता है।
◆ जैवमंडल आगर की घोषणा तथा नामकरण केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाता है और यह क्षेत्र जिस देश में रहता है संपूर्ण अधिकार उसी देश के पास रहता है। भारत में कुल 18 बायोस्फीयर रिजर्व है।
◆ एक बायोस्फीयर रिजर्व तीन हिस्सों में बँटा रहता है-
◆ भारत के प्रमुख जैवमंडल आगर- नीलगिरि, नंदा देवी, नोकरेक,, सुंदरवन, कंचनजंघा, पंचमढ़ी आदि।
◆ वानस्पतिक उद्यान एक कृत्रिम आवास जहाँ विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के पादप की महत्वपूर्ण तथा विशिष्ट प्रजाति को संग्रह किया जाता है। वानस्पतिक उद्यान में संकटग्रस्त पादपों को भी संरक्षित किया जाता है।
◆ वानस्पतिक उद्यान में शोध तथा अनुसंधान के माध्यम से विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के आवासों की वानस्पतिक प्रजातियों का एक स्थानीय आवासीय क्षेत्रों में विकास एवं संरक्षण के लिए तकनीक विकसित की जाती है। इसके अलावे पादप की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, रोगमुक्त रखने हेतु विदेशी प्रजाति या उन्नत प्रजाति से उसका संरक्षण कराकर नये-नये किस्म के पादप तैयार किये जाते हैं।
◆ चिड़ियाघर एक कृत्रिम आवास है जहाँ जीव-जंतु, पक्षी एवं जीवों की दुर्लभ तथा संकटग्रस्त प्रजाति को रखा जाता है। चिड़ियाघर का निर्माण जैव विविधता के बाहा स्थाने संरक्षण हेतु किया जाता है परंतु आजकल यह मानव के प्रमुख मनोरंजन केन्द्र का भी स्थल बन चुका है।
◆ भारत में स्थित सभी चिड़ियाघरों का संचालन हेतु सभी मानकों का निर्धारण केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा की जाती है, जिसकी स्थापना भारतीय वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत किया गया है।
◆ एक जाति में कुल अनुवांशिक विविधता को जीन पूल कहते हैं। जीन पूल सेंटर वे स्थान हैं जहाँ फसलों की महत्वपूर्ण प्रजातियाँ और स्थानिक जंतुओं की प्रजातियाँ पाई जाती है और इन केन्द्रों पर अनुवांशिक विविधता को एकत्र करने का प्रयास किया जाता है ताकि भविष्य में प्रयोग में लाया जा सके। जीन पूल केन्द्र के अंतर्गत विश्व के महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्र शामिल हैं, इनमें प्रमुख निम्न है-
◆ जीन बैंक के अंतर्गत वृक्षों के बीजों, जंतुओं के स्पर्म एवं अण्डा को सामान्य तापक्रम पर एक जैवकीय फ्रीज में रखा जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे उपयोग में लाया जाता है।
◆ भारत में तीन मुख्य संस्थान है जो जीन बैंक के तरह कार्य करता है, यह निम्न है-
◆ इस तकनीक के अंतर्गत पादप तथा जंतु के अनुवांशिक पदार्थ (कोशिका, उत्तक, अंग आदि) को द्रव नाइट्रोजन में अत्यंत ही निम्न ताप पर रखा जाता है। बाहा स्थाने संरक्षण की यह तकनीक काफी आधुनिक तकनीक है जो लम्बे समय तक अनुवांशिक पदार्थों की कार्यक्षमता को बनाए रखता है।
● जैव विविधता हॉट स्पॉट ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ जैव विविधता प्रचुर मात्रा में उपस्थित रहते तथा वहाँ स्थानीय प्रजाति की प्रचुरता पायी जाती है। हॉट स्पॉट स्व स्थाने संरक्षण का उदाहरण है।
● हॉट स्पॉट के अवधारणा का प्रतिपादन नॉर्मन मायर्स ने किया था। किसी भी क्षेत्र को हॉट स्पॉट घोषित करने हेतु निम्न मापदण्ड बनाये गये हैं-
● वर्तमान में विश्व में 36 हॉट स्पॉट है जो पृथ्वी के स्थलीय क्षेत्रों को 2.3 प्रतिशत भाग पर फैले हुए है परंतु इन हॉट स्पॉट क्षेत्रों में विश्व के पौधे, पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचरों की 60 प्रतिशत प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
● हॉट स्पॉट में भी कुछ हॉट स्पॉट ऐसे हैं जहाँ स्थानीक प्रजाति की काफी अधिक प्रचुरता है, ऐसे हॉट स्पॉट को Hottest Hotspots कहा जाता है। Hottest Hotspots की श्रेणी में विश्व के 8 हॉट स्पॉट क्षेत्र को रखा गया है।
● भारत में कुल 4 हॉट स्पॉट है जिनमें 2 को Hottest Hotspots की श्रेणी में रखा गया है। भारत के 4 हॉट स्पॉट हैं- 1. पूर्वी हिमालय या हिमालय क्षेत्र, 2. इंडो-वर्मा क्षेत्र, 3. पश्चिमी घाट और 4. सुंडालैंड।
● भारत के 4 हॉट स्पॉट पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में नहीं है। भारत के अंतर्गत आने वाले हॉट स्पॉट क्षेत्रों में पश्चिमी घाट हॉट स्पॉट क्षेत्र में 64.95 प्रतिशत, इंडो-वर्मा में 5.13 प्रतिशत, हिमालय क्षेत्र में 44.37 प्रतिशत और सुंडालैंड हॉट स्पॉट में 1.28 प्रतिशत क्षेत्र सम्मिलित है।
● आपत्तिग्रस्त प्राणी और पौधों की सूची एवं उनकी जानकारी एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित की गई है, जिसे रेड डाटा बुक नाम दिया गया है। यह रेड डाटा बुक IUCN (International Union for Conservation of Nature) वैश्विक प्रजाति कार्यक्रम तथा प्रजाति उत्तरजीविता आयोग के साथ मिलकर प्रकाशित करता है।
● IUCN की Red Data Book में प्रजाति को उनकी स्थिति के अनुसार कुल नौ श्रेणी में रखा गया है। यह श्रेणी निम्न है-
◆ आर्द्रभूमि के जैव विविधता को संरक्षण हेतु 1971 में ईरान के रामसर एक सम्मेलन हुआ और शहर के नाम पर ही इस सम्मेलन को रामसर सम्मेलन कहा जाने लगा। इस सम्मेलन के समझौतों को 1975 में लागू किया गया और भारत 1982 में इस समझौते में शामिल हुआ।
◆ रामसर समझौता या संधि के कार्यान्वयन हेतु भारत सरकार ने 1985-86 के दौरान राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम चलाया। वर्तमान में भारत के 115 आर्द्रभूमि में से 92 आर्द्रभूमि रामसर संधि के अंतर्गत शामिल है।
◆ जैव विविधता संरक्षण का यह समझौता कोलंबिया के कार्टाजेना शहर में 29 जनवरी 2000 को सम्पन्न हुआ तथा समझौते की शर्तों को 11 सितंबर 2003 को लागू किया गया।
◆ इस संधि के तहत ऐसे जेनेटिक बीज या पशु को प्रतिबंधित करना शामिल है जो पर्यावरण को हानि पहुँचा सकता है।
◆ नागोया सम्मेलन वर्ष 2010 में जापान के नागोया शहर में हुआ था। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य था- आनुवांशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों के स्वस्थ एवं समान बँटवारा तथा जंगल, कोरलरीफ और जैव विविधता का सुरक्षा।
◆ भारत भी इस सम्मेलन में शामिल है।
◆ 1972 में स्टॉक होम सम्मेलन के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भारत सरकार यह कानून पास किया जिसका मुख्य उद्देश्य था- वन्य जीव की रक्षा, तस्करी तथा अवैध शिकार से बचाव एवं अवैध व्यापार पर रोक लगाना। इसी अधिनियम के तहत सलाहकारी निकाय ‘वन्य जीव सलाहकार बोर्ड’ स्थापित किया गया जो राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों को राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य की पहचान करने में मदद करता है।
◆ भारत में प्रथम राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना 1983 में अपनाई गई जिसे आगे चलकर संशोधित किया गया। राष्ट्रीय वन्य जीव कार्य योजना का मुख्य उद्देश्य है-
◆ संसद द्वारा 23 मई, 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम पारित किया गया। इसका भी संदर्भ 1972 के स्टॉक होम पृथ्वी सम्मेलन से था। पर्यावरण संरक्षण के अलावे प्रदूषण के लिए भी यह एक सशक्त एवं व्यापक अधिनियम है।
◆ पशुओं पर हो रही क्रूरता रोकने के लिए यह अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम के तहत पशुओं के पंजीकरण, जन्मदर नियंत्रण, परिवहन के लिए पशुओं के उपयोग संबंधी प्रावधान, कसाईखाने संबंधी प्रावधान की व्याख्या की गई है। इसी अधिनियम में पशुओं को सर्कस से मुक्त कराने का प्रावधान है।
◆ जैव विविधता के संरक्षण के लिए भारतीय संसद द्वारा वर्ष 2002 में इसे पारित किया गया, जिसके तहत तीन कार्यकारी इकाई का गठन किया गया।
◆ भारत में पहली बार 1894 में ही वन नीति लागू किया गया था पुनः आजादी के बाद 1952 में इसमें संशोधन किया गया। नये सिरे से राष्ट्रीय वन नीति 1988 में बनाई गई। इस नीति में यह लक्ष्य बनाया गया कि देश की कुल क्षेत्रफल का कम से कम एक तिहाई क्षेत्रफल वनों एवं वृक्षों से आच्छादित होनी चाहिये जिसमें पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में यह दो तिहाई से कम नहीं होना चाहिये।
◆ पर्यावरण, वन, जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1988 के राष्ट्रीय वन नीति को प्रतिस्थापित कर नई वन नीति (2016) लागू करने हेतु जनता से सुझाव आमंत्रित किये है।
◆ इसकी स्थापना वर्ष 1984 में हुआ था। इसका मुख्यालय अहमदाबाद में स्थित है। यह केन्द्र पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देता है। पर्यावरण शिक्षा केन्द्र भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
◆ यह केन्द्र पक्षियों के संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध है साथ ही यह जैव विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक तकनीकी एवं वैज्ञानिक सहायता प्रदान करता है।
◆ भारत के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत इसकी स्थापना 5 जून, 1990 को कोयंबटूर में किया गया।
◆ यह संस्था भारत के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है। इसकी स्थापना 1982 में हुई तथा इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के देहरादून में स्थित है।
◆ भारत सरकार द्वारा 1965 में शुरू किये गये ‘प्री इन्वेस्टमेंट सर्वे ऑफ फॉरेस्ट रिसोर्सेस’ के स्थान पर 1981 में भारतीय वन सर्वेक्षण का गठन किया गया। यह संगठन भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत आता है। इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के देहरादून में स्थित है। यह संस्था नियमित अंतराल में देश के वन संसाधनों के मूल्यांकन का कार्य करता है।
◆ इसकी स्थापना सर्वप्रथम 1890 में हुई थी। पुनः भारत सरकार द्वारा 29 मार्च, 1954 को इसका नये सिरे से पुनर्गठन किया। इसका मुख्यालय कोलकाता में स्थित है।
◆ भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन सर्वेक्षण, प्रलेखन और संरक्षण के माध्यम से देश के वन्य, पादप संसाधनों संबंधी वर्गिकी और पुष्पण अध्ययन करने के लिए एक शीर्ष अनुसंधान संगठन है।
◆ इस संस्था की स्थापना 1 जुलाई, 1916 को की गई थी। इसका मुख्यालय अलीनगर (कोलकाता) में स्थित है तथा यह संस्था भी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन है।
◆ यह संस्था का उद्देश्य, प्राकृतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण जानवरों के विषय में सर्वे, अन्वेषण एवं अनुसंधान द्वारा जानकारी इकट्ठा करना है। इस संस्था द्वारा ‘भारत की प्राणिजात’ नामक पत्रिका का प्रकाशन होता है।
◆ इसकी स्थापना पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार तथा सी. पी. रामास्वामी अय्यर फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। यह संस्था दक्षिण भारत में पर्यावरण शिक्षा के लिए किये जा रहे प्रयास में अग्रणी केन्द्र है और अधिक से अधिक लोगों तक जागरूकता एवं पर्यावरण हितों को बताने के लिए कई कार्यक्रम चलाता है।
◆ यह संस्था चेन्नई में स्थित है।
◆ CSE एक गैर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना 1980 में अनिल कुमार अग्रवाल द्वारा नई दिल्ली में की गई थी।
◆ इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है पर्यावरण और विकास के संबंधों का अध्ययन, अनुसंधान और मूल्यांकन कर सतत विकास के प्रति लोगों में चेतना जागृत करना। प्रसिद्ध पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ का प्रकाशन इसी संस्था द्वारा किया जाता है।
◆ BNHS की स्थापना 15 सितंबर 1883 को बम्बई में आठ प्रकृतिवादियों द्वारा किया गया था जिनमें आत्माराम पांडुरंग भी शामिल थे।
◆ इस संगठन ने भारत में जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण के लाए अनुसंधान कार्य करने वाला सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है। यह बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी नाम से एक जर्नल तथा हॉर्नबिल नामक मैगजीन का प्रकाशन करता है। इस संगठन का लोगो हॉर्नबिल पक्षी है।